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    नैनो तकनीक से मोबाइल की बैटरी लाइफ बढ़ेगी, हैंग होने की समस्या होगी खत्म

    Published: Fri, 13 Oct 2017 11:04 AM (IST) | Updated: Fri, 13 Oct 2017 11:06 AM (IST)
    By: Editorial Team
    nano tech mp 13 10 2017

    इंदौर, नईदुनिया रिपोर्टर। नैनोटेक्नॉलाजी के क्षेत्र में भारत में अपार संभावनाऐं हैं लेकिन सरकार और इंडस्ट्रीज के सहयोग के बिना इस क्षेत्र में कार्य कर रहे वैज्ञानिकों को आधारभूत संरचनाओं और फंड्स की कमी का सामना करना पड़ता है जिसके चलते इस क्षेत्र में काम कर रहे वैज्ञानिक विदेश जाकर शोध करने को ही प्राथमिकता देते हैं।

    भारतीय मूल के वैज्ञानिक डॉ अजय कुमार यगती जो दक्षिण कोरिया में नैनोटेक्नोलॉजी के क्षेत्र में पिछले दस सालों से कार्य कर रहे हैं ने नईदुनिया से बातचीत के दौरान बताया की भारत के सर्वोत्तम संस्थानों में भी शोध की उतनी सुविधाएं नहीं हैं जितनी विदेशों में हैं। यहां व्यवहारिक ज्ञान की जगह सैद्धांतिक पढ़ाई पर ज्यादा जोर दिया जाता है इसलिए यहां पढ़ाई की तुलना में आउटपुट या परिणाम उतने नहीं मिलते। कांफ्रेंस में यगती ने नैनो डिवाइस का प्रदर्शन किया जिससे मानव गैस्ट्रीक कैंसर सेल के उपचार में उपयोग किया जा सकता है।

    नैनो स्ट्रक्चरस के उपयोग के बारे में जानकारी देते हुए नई दिल्ली से आये आयन बीम संस्था के प्रेसीडेंट डी के अवस्थी ने कहा की आने वाली सदी नैनो स्ट्रक्चर्स की ही है स्वास्थ्य, ऊर्जा, डिफेंस, तकनीक सभी क्षेत्रों ने इसकी अनेक उपयोगिताऐं हैं। जीपीएस डिवाइजेज में नैनो चिप का उपयोग सेफ्टी और सिक्यूरिटी के लिए किया जा रहा है, स्मार्टफोन्स में नैनो पार्टिकल्स के उपयोग से मोबाइल जल्दी चार्ज होगा, उसकी बैटरी की लाइफ बढ़ेगी और फोन हैंग भी कम होगा। इससे कम खर्चे में, कम बैटरी उपयोग में माइक्रो स्ट्रक्चर्स की तुलना में 1000 गुना ज्यादा पॉवर मिलती है।

    कैंसर, अल्झाइमर बीमारियों के इलाज में प्रभावी

    नई दिल्ली से आए वैज्ञानिक डॉ दिनाकर कांजीलाल ने बताया की नैनो ड्रग्स खून में घुलकर बीमारी वाली जगह पंहुंचने की बजाय प्रभावित क्षेत्र में सीधे पंहुचती है जिससे तुरंत और प्रभावी इलाज के साथ साइड इफेक्स भी कम होते हैं। यह सिर्फ कैंसर की प्रभावित कोशिकाओं को ही मारती है और जरुरत के मुताबिक ही उपयोग होती है। नैनो बॉयोसेंसर अल्झाइमर रोग की पहचान और इलाज में भी अति उपयोगी हैं।

    डॉ कांजीलाल ने बताया की नैनोटेक्नालॉजी के क्षेत्र में नई खोजों में आयन बीम से हाइड्रोफोबिक सतह तैयार की जाती है जिससे उसके ऊपर पानी का असर न हो और वह गंदगी को जमने न दे इस तरह से ये संरचनाएं सेल्फ क्लीनिंग का काम करती हैं।

    फोरेंसिक साइंस के क्षेत्र में नैनो पार्टिकल्स से यह पता किया जा सकता है कि किसी पेय पदार्थ में कोई ड्रग मिलाई है या नहीं । उद्योगों से निकले गंदे पानी को साफ करने में भी ये पेपर बेस्ड नैनो बॉयो सेंसर काफी उपयोगी हैं।

    इंडस्ट्रीज की मदद से काफी आगे जा सकते हैं

    कांफ्रेंस में आए वैज्ञानिकों ने कहा कि इंडस्ट्रीज शुरु से विज्ञान से दूरी बनाये रखती हैं क्योंकि दोनों के बीच आपसी विश्वास की कमी है। इसीलिए हमारे यहां रिसर्च एंड डेवलपमेंट में निवेश नहीं करते। जहां एक और इंडस्ट्रीज जल्दी रिजल्ट चाहतीं है वहीं दूसरी और हमारे देश में वैज्ञानिकों का भी दृष्टिकोण काफी संकीर्ण है वे आउटपुट पर ज्यादा ध्यान नहीं देते। इस हेतु दोनों को एक दूसरे के साथ सहयोग करना चाहिए।

    सरकारी फंड्स की दरकार

    भारत नैनो तकनीक के क्षेत्र में शोध पत्र प्रस्तुत करने में पूरी दुनिया में तीसरे स्थान पर है लेकिन इस क्षेत्र में रिसर्च में जीडीपी में निवेश में 18वें स्थान पर है। जबकि दूसरे देशों में यह निवेश बहुत अधिक है। जहां विकसित देश जीडीपी का 2 से 3 प्रतिशत शोध में खर्च करते हैं हमारे यहां वो 1 प्रतिशत से भी कम है। देवी अहिल्या विश्वविद्यालय में नैनो स्ट्रक्चरस पर अंतर्राष्ट्रीय कांफ्रेंस में देश विदेश के 150 से अधिक डेलीगेट्स ने हिस्सा लिया।

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