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    'बनावटीपन से तौबा करते ही लोग आपसे प्यार करने लगेंगे'

    Published: Sun, 19 Oct 2014 08:46 PM (IST) | Updated: Sun, 19 Oct 2014 09:28 PM (IST)
    By: Editorial Team
    shri m last 19 10 2014

    अनिल त्रिवेदी, इंदौर। 'हिमालयवासी गुरुजी के साए में- एक योगी का आत्मचरित्र' किताब लिखते समय मैंने कल्पना भी नहीं की थी कि ये बेस्टसेलर बुक्स में शुमार हो जाएगी। दरअसल किताब लिखते समय मेरे मन में जो बातें आईं, सहजता से लिखता गया। खुले दिल से लिखी गई बातों ने पढ़ने वालों के दिलों पर भी सीधा असर किया। शायद इसी वजह से अंग्रेजी में लिखी किताब का भारत की तमाम भाषाओं में अनुवाद हुआ। मुझे लगता है कि जब हम बनावटीपन से तौबा कर लोगों से सीधी बात करेंगे तो लोग आपसे प्यार करने लगते हैं।

    ये विचार आध्यात्मिक मार्गदर्शक, समाज सुधारक और शिक्षाविद् श्री एम ने सिटीलाइव से खास चर्चा में व्यक्त किए। यूनिवर्सिटी ऑडिटोरियम में सोमवार शाम आयोजित विशेष कार्यक्रम में शिरकत करने शहर आ रहे श्री एम ने कहा कि हम ऊपरी भिन्नाता में ऐसे उलझ गए हैं कि भीतरी एकरूपता के बारे में सोचना ही छोड़ दिया है। 'मानव एकता मिशन' और 'सत्संग फाउंडेशन' के माध्यम से मेरा प्रयास प्राणीमात्र के बीच आंतरिक संबंध को जन-जन तक पहुंचाने का है।

    पुनर्जन्म में विश्वास

    कई लोगों का मानना है कि पुनर्जन्म नहीं होता है। मगर मेरी अनुभूति अलग है। जब मेरे गुरु महेश्वरनाथ ने नौ साल की उम्र में मुझसे पूछा तुम्हें कुछ याद आ रहा है? तो मुझे कुछ समझ नहीं आया। मगर धीरे-धीरे परतें खुलने लगीं और बहुत कुछ याद आने लगा। 10 साल बाद हिमालय में जब उनसे दोबारा मिला तो सब बातें और साफ होने लगीं। ढाई-तीन साल तक उनके साथ रहा। गुरु ने मुझे भी अपने जैसा बना लिया, जैसे किसी चुम्बक के संपर्क में लगातार रहने से लोहे में भी उसके गुण आ जाते हैं।

    6500 किमी लंबी पदयात्रा का मकसद

    बाबा ने ही मुझे आदेश दिया कि गुफा में बैठकर साधना करने से बेहतर है समाज के बीच जाकर अपनी साधना को आजमाओ। लोगों को सही राह दिखाओ और जगत में सत्य-प्रेम फैलाओ। इंद्रिय-नियंत्रण, समभाव और सबको एक साथ लेकर चलने की कोशिश में सफल हो जाओगे तभी सच्चे योगी बनोगे। अगले साल कन्याकुमारी से कश्मीर तक 6500 किमी लंबी पदयात्रा का भी यही मकसद है कि लोगों के बीच ज्यादा से ज्यादा अपनत्व की भावना का प्रसार हो। युवा इस काम में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

    मुमताज से श्री एम बनने की दास्तां

    मुमताज अली खान से श्री एम बनने की दास्तां बयां करते हुए वे कहते हैं कि जाति-धर्म में मेरा यकीन नहीं है। इसलिए मैं अपने नाम के पहले अक्षर एम से ही अपना परिचय 'आई एम एम' कहकर देता था। करीब 10 साल पहले जैसलमेर महाराजा की सबसे छोटी बेटी रश्मि ने मुझे 'श्री एम' से संबोधित किया और फिर यही नाम पॉपुलर हो गया।

    व्याख्यान आज

    मानव एकता मिशन और देवी अहिल्या यूनिवर्सिटी के संयुक्त तत्वावधान में सोमवार शाम 5.30 बजे यूनिवर्सिटी ऑडिटोरियम में श्री एम का व्याख्यान आयोजित किया जाएगा। इसमें वे 'मंथन-आंतरिक खजाने का प्रबंधन' विषय पर संबोधित करेंगे।

    और जानें :  # sri m interview
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