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    दादा-दादी की कमी खली तो घर को ही बना लिया बुजुर्गों का आशियाना

    Published: Thu, 14 Sep 2017 11:54 AM (IST) | Updated: Thu, 14 Sep 2017 06:23 PM (IST)
    By: Editorial Team
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    इंदौर, नईदुनिया रिपोर्टर। लीलाबाई के चहरे की झुर्रियां उनकी उम्र का हिसाब साफ बयां कर देती हैं। वक्त के साथ अपनों के धोखा देने की बेबसी को वे बंद लफ्जों में समेटे हुए है और अब तो शरीर भी नाराजगी जता देता है। उम्र के 75 वर्ष पार कर चुकी लीलाबाई को अब सुनाई नहीं देता इसलिए वे इस बात से तो निश्चिंत हैं कि कोई उनके बारे में क्या कह रहा है लेकिन उनके मन में घाव इतने गहरे हैं कि वे अक्सर आंसुओं से जाहिर हो जाते हैं।

    रतलाम में बेटे-बहू के होने के बावजूद ये इन दिनों अपने ही तरह उन बुजुर्गों के साथ रह रही हैं जिन्हें या तो घर से बेदखल अपनों ने ही कर दिया या फिर जो याददाश्त जाने, भटक जाने के कारण घर से अलग हो गए। इन्हीं में से एक और है तुलसी बाई जिसने पिछले करीब 50 वर्ष लोगों के घरों में काम करके तो बिता दिए पर अब अकेलेपन को वे अपनी उम्र के अन्य लोगों के साथ कम कर रही हैं। संतान नहीं होने और पति कि मृत्यु के बाद भी इन्होंने खुद को लाचार नहीं होने दिया पर अब शरीर साथ नहीं देता कि वे खुद कुछ कमा सकें, अपना ध्यान रख सकें।

    शहर के युवाओं की पहल अब ऐसे ही बुजुर्गों के लिए नया परिवार बना रही है जिसमें 70 की दहलीज पार कर चुके बुजुर्ग बतौर दादा-दादी बनकर रह रहे हैं और पोते-पोतियों के रूप में युवाओं की टोली इनकी देखभाल कर रही है। गांधी नगर स्थित किसी घर में अगर बहुत से बुजुर्ग साथ में हंसी-खुशी रहते दिखें तो समझ जाएं कि यह श्रीराम निराश्रित वृद्धाश्रम है जहां युवाओं की कोशिश साथ रहकर बची हुई जिंदगी को खुशनुमा बना रही है।

    अपने बेडरूम से हुई शुरुआत आश्रम में तब्दील

    इस आश्रम की शुरुआत 23 वर्षीय युवा यश पाराशर ने करीब पौने दो साल पहले अपने घर से की थी। रक्तदान करने के लिए जब वे एमवाय अस्पताल गए तो उन्हें वहां वृद्धा मिली जिसका अपना कोई नहीं था। उसे वे अपने घर ले आए। घर छोटा था इसलिए अपना बेडरूम उन्हें दे दिया। सोशल मीडिया पर इस नेक काम की बात साझा की तो दोस्तों ने ऐसे ही अन्य वृद्धों का दर्द भी बताया और घर में एक वृद्धा को और भी लाने का निर्णय लिया गया। इस तरह परिवार बढ़ता गया और स्थिति यह हुई कि इन्हें अलग से घर लेना पड़ा और नाम रखा श्रीराम निराश्रित वृद्धाश्रम।

    दोस्तों ने भी दिखाई रूचि

    यश पाराशर बताते हैं कि उनके परिवार में मां और एक बहन ही है। उन्हें दादा-दादी की कमी खलती थी और जब वे बुजुर्गों को घर लाए तो मां ने भी साथ दिया। इनके इस प्रयास में संदीप शर्मा भी शामिल हुए और इसके बाद कार्य करने वाले और वृद्धों दोनों की संख्या बढ़ती गई। कार्य को आसान करने के लिए नार्मदीय सेवा फाउंडेशन बनाया। अभी तक ये 24 बुजुर्गों को यहां ला चुके हैं जिनमें से 16बुजुर्गों के परिजनों से काउंसलिंग कर उन्हें वापस परिवार में शामिल कर चुके हैं। यहां निराश्रित बुजुर्गों को कभी पुलिस की मदद से तो कभी दोस्तों की जानकारी के आधार पर लाया जाता है। वर्तमान में पुरुषोत्तम बड़ोदिया, संतोष ठाकुर, नरेंद्र थोराट, अन्नापूर्णा बोले, प्रेरणा बिल्लौरे इन दोनों युवाओं का सहयोग कर रहे हैं।

    मदद की एक कोशिश यह भी

    इन युवाओं की प्राथमिकता निराश्रित बुजुर्गों को यहां रखने के बजाए उनके परिवार का ही अंग बनाने की रहती है। ऐसे बुजुर्ग जिन्हें उनके अपनों ने घर से निकाल दिया है उनकी काउंसलिंग करने और न्याय दिलाने में पुलिस और वकील प्रसुन्ना बिरथरे की मदद ली जाती है। अपनों से भटक चुके बुजुर्गों को घर पहुंचाने के लिए सोशल नेटवर्किंग का सहारा लिया जाता है। ग्रुप के सभी साथी अपनी कमाई में से निश्चित राशि एकत्रित कर इस आश्रम को संचालित कर रहे हैं।

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