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    खंडवा में 87 लोगों का परिवार, एक बार में बनती है 30 किलो आटे की रोटियां

    Published: Sun, 14 May 2017 09:26 PM (IST) | Updated: Mon, 15 May 2017 07:56 AM (IST)
    By: Editorial Team
    khandwafamily 14 05 2017

    खंडवा/टीम नईदुनिया। खंडवा से लगभग 35 किमी दूर लालमाटी गांव में कदम रखते ही बारेला परिवार का दबदबा नजर आने लगता है। रेलवे क्रॉसिंग पार होते ही इस छोर से उस छोर तक यही कुनबा दिखाई पड़ता है। कोई खेत पर काम कर रहा है, कोई मशीन चला रहा है, किसी के पास हाट-बाजार की जिम्मेदारी है तो कोई जानवरों की देखभाल कर रहा है।

    घर की रसोई से लेकर बच्चों को संभालने तक की ड्यूटी भी बारी-बारी से लगती है। 87 लोगों के इस संयुक्त परिवार की धुरी 75 वर्षीय मेलादीबाई बारेला हैं, जो 9 बेटों, 39 पोते-पोतियां, 23 पड़पोते-पड़पोतियां और 15 बहुओं को साथ लेकर तीन पीढ़ियों की डोर थामे हुए हैं। इस परिवार का सबसे छोटा सदस्य 5 महीने का है।

    आदिवासी तबके से ताल्लुक रखने वाली मेलादीबाई के पास तारीखों का कोई हिसाब-किताब नहीं है। 9 बेटे और एक बेटी को पालने, बड़ा करने और शादियों की जिम्मेदारी के बीच उन्हें कभी नहीं लगा था कि परिवार इतना बड़ा हो जाएगा और वे उन्हें इसी तरह एक ही छत के नीचे यूं रख पाएंगी। करीब 15 साल पहले पति नरेंद्र बारेला की मौत के बाद उन्होंने परिवार की बागडोर संभाली और गले में हार के बजाय चाबियों का गुच्छा डाल लिया...ये चाबियां तिजोरी से लेकर रसोई तक की हंै।

    मेलादीबाई का प्रबंधन

    रसोई

    सभी बेटों के कमरे अलग-अलग हैं, मगर रसोई एक है। हर रोज बारी-बारी से तीन बहुओं की ड्यूटी लगती है। दो बहुएं रोटियां बनाती हैं तो एक सब्जी। एक बार में 30 किलो आटे की रोटी बनती है। वहीं, दिनभर में 12-13 किलो सब्जियां लगती हैं। सभी सब्जियां खुद के खेत में उगाते हैं। सुबह पांच बजे से खाना बनना शुरू होता है।

    राशन

    बड़े बेटे नकलिया बताते हैं-खेतों में जो भी पैदा होता है उसमें से 150 क्विंटल गेहूं घर के लिए रख लेते हैं। इतनी ही दाल रखते हैं। बाकी बेच देते हैं। हिसाब सभी भाई मिलकर करते हैं और खर्च पर मेलादीबाई की नजर रहती है।

    रोजगार

    तीसरी पीढ़ी में सबसे ज्यादा पढ़ा-लिखा 11वीं पास रमेश बताता है वर्तमान में 100 एकड़ जमीन है। बोवनी से लेकर कटाई सबकुछ परिवार के सदस्य मिलकर करते हैं। आय बढ़ाने के लिए 50 एकड़ खेती बंटाई पर भी ले रखी है।

    तीसरी पीढ़ी देख रही है डॉक्टर बनने का सपना

    आदिवासी पारिवारिक पृष्ठभूमि की वजह से दूसरी पीढ़ी ज्यादा नहीं पढ़ पाई, लेकिन तीसरी पीढ़ी में कई बच्चे 11वीं तक पढ़ लिए। इनमें से 12वीं का छात्र अशोक डॉक्टर बनना चाहता है। वह नीट की तैयारी भी कर रहा है।

    बैंक ने किया सम्मान, परिवार को बनाए रखने के लिए जमीनों पर निवेश

    समय से पहले लोन चुकाने और अच्छे ग्राहक के रूप में बैंक ऑफ महाराष्ट्र ने हाल ही में मेलादीबाई के परिवार का सम्मान भी किया। सहायक मैनेजर संतोष शर्मा बताते हैं कि इस परिवार की सबसे बड़ी विशेषता है कि यह अपनी आमदनी बढ़ाने के लिए लगातार जमीनों और कृषि उपकरणों में निवेश कर रहे हैं। यही उनके संयुक्त बने रहने का राज भी है और ताकत भी। बैंक में इन सभी भाइयों का खाता अलग-अलग है मगर सभी बैंक से पैसा लेकर मां मेलादीबाई के पास जाते हैं। फिर सब मिलकर जिस पर कर्ज होता है उसे पहले चुका देते हैं।

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