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    हरि की बांसुरी और बिस्मिल्ला की शहनाई सुन गाय देने लगीं ज्यादा दूध

    Published: Wed, 13 Sep 2017 05:49 PM (IST) | Updated: Thu, 14 Sep 2017 10:45 AM (IST)
    By: Editorial Team
    cow gives more milk 2017914 9210 13 09 2017

    विवेक वर्द्धन श्रीवास्तव/जितेंद्र सुराणा, बड़वाह। शायद आप यकीन नहीं करेंगे, परंतु यह उतना ही सच है कि संगीत का सीधा प्रभाव कुछ दिनों से पालतू मवेशियों पर दिखने लगा है। नियत समय पर इन मवेशियों को हरिप्रसाद चौरसिया, बांसुरी की धुन, बिस्मिल्ला खां की शहनाई वादन या अन्य मधुर धुनों का इंतजार रहने लगा है।

    जैसे ही म्यूजिक सिस्टम पर यह संगीत बजने लगता है, वैसे ही गौरी, श्यामा हो या कपिला रंभाने लगती हैं। जिले के आली खुर्द गांव में गौपालकों द्वारा किया गया यह प्रयोग दो माह में ही सकारात्मक असर दिखाने लगा है। उल्लेखनीय है कि इस गांव के गजेंद्र बर्वे व अन्य दो साथियों ने अपने फार्म हाउस पर दूसरी नस्ल की गायों को पाला है। इस फार्म हाउस पर 14 गायों पर यह प्रयोग पिछले दो माह से किया जा रहा है। यह गायें राजस्थान से लाई गई हैं।

    बांसुरी की धुन से बदल गया स्वभाव

    गौपालक गजेंद्र बर्वे, अभिषेक चतुर्वेदी व विपिन बर्वे ने बताया कि उन्होंने नवाचार के तहत राजस्थान से कुछ गायों को लाकर यहां पालने का निर्णय लिया। शुरूआत में स्थान और वातावरण बदलने के कारण इन गायों के स्वभाव में चिड़चिड़ापन था। यह किसी के भी पास पहुंचते ही उन्हें लात और सींग मारने लगती थी।

    कुछ परिचितों ने यह परेशानी बताई। इसका हल संगीत के रूप में निकाला। गौशाला में गायों के बांधने के स्थान पर म्यूजिक सिस्टम लगाया गया। सुबह और शाम हरिप्रसाद चौरसिया सहित अन्य बांसुरी वादकों की रिकार्डेड धुन, शहनाई वादन सहित अन्य शास्त्रीय संगीत बजाया जाता है।

    उनके अनुसार लगभग एक माह में गायों के स्वभाव में बदलाव आया। गायें शांत रहने लगीं। दूध निकालने के समय ये अब भड़कती नहीं हैं। उनका कहना है कि यह दावा नहीं किया जा सकता कि म्यूजिक से दूध देने की क्षमता में बढ़ोतरी हुई है। हालांकि दो गायों ने दो-दो लीटर दूध अधिक देना शुरू किया है। ये गायें छह से दस लीटर दूध प्रतिदिन दे रही हैं।

    इनका कहना है

    संगीत पुरातनकाल से अभी तक प्रिय रहा है। संगीत की धुन प्राणीमात्र को सुकून देती है। मवेशियों में संवेदनशीलता के कई उदाहरण देखने को मिले हैं। इस घटनाक्रम में भी मवेशी संभवत: संगीत से प्रभावित होकर सकारात्मक प्रभाव दे रहे हैं। - प्रेरणा कोल्हटकर, संगीत विशेषज्ञ मंडलेश्वर

    मवेशी भी हमारी तरह संवेदनशील हैं। हमेशा यदि वातावरण सही मिले तो मवेशी अथवा वन्य प्राणी भी प्रकृति का साथ देते हैं। इससे मेटाबालिजम ठीक रहता है। साथ ही मवेशी के स्वास्थ्य पर भी सकारात्मक असर दिखाई देगा। इस प्रयास की सराहना की जाना चाहिए। जिले में अन्य एक-दो स्थानों पर यह प्रयोग किए जा रहे हैं। इस पर मॉनीटरिंग की जाएगी। - डॉ राजू रावत, उपसंचालक, पशु चिकित्सा विभाग

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