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    चार गुना बढ़े मलेरिया के मरीज, फोकस सिर्फ डेंगू पर,धुआं करने की मशीनें कमरों में बंद

    Published: Mon, 14 Aug 2017 04:02 AM (IST) | Updated: Mon, 14 Aug 2017 04:02 AM (IST)
    By: Editorial Team

    एक अगस्त से पहले तक 15 मरीज आ रहे थे हर हफ्ते, अब 60 मरीज

    - सितंबर 2015 में हर हफ्ते 70 मरीज तक हो गए थे

    भोपाल। नवदुनिया प्रतिनिधि

    डेंगू, चिकनगुनिया के साथ ही अब मलेरिया के मरीज भी शहर में तेजी से बढ़ रहें हैं। पिछले महीने तक हर हफ्ते 15 से 20 मरीज मिल रहे थे, लेकिन अब यह आंकड़ा 60 के ऊपर तक जा रहा है। स्वास्थ्य विभाग ने रोकथाम के उपाय नहीं किए तो मरीजों की संख्या 100 के ऊपर तक पहुंच सकती है। चार गुना मरीज बढ़ने के बाद भी स्वास्थ्य विभाग का फोकस सिर्फ डेंगू पर है। अमले की कमी के चलते वाइवेक्स मलेरिया के केस में मच्छर मारने व लार्वा नष्ट करने का काम नहीं हो रहा है। मच्छर मारने की नगर निगम की फॉगिंग मशीनें भी बहुत चल रही हैं।

    चिंता की बात यह है कि फेल्सीपेरम मलेरिया के केस भी इक्का-दुक्का आ रहे हैं। यह मलेरिया जानलेवा है। इसके बाद भी मलेरिया-डेंगू के लिए संवदेनशील इलाकों में भी मच्छर मारने के लिए दवाओं का छिड़काव नहीं किया जा रहा है। घरों के भीतर दवाएं छिड़कने का काम स्वास्थ्य विभाग का है, जबकि बाहर नगर निगम का। बारिश के सीजन में मच्छरों की संख्या बढ़ जाती है, लिहाजा उन्हें मारने के लिए मशीनें से सैंथेटिक पायरेथ्राइड का धुआं किया जाता है। हकीकत यह है कि नगर निगम की फॉगिंग मशीनें शहर में कहीं नहीं दिख रही हैं। 'नवदुनिया' ने इस संबंध में मलेरिया और डेंगू के लिए स्वास्थ्य विभाग द्वारा संवेदनशील घोषित की गई कॉलोनियों में लोगों से पूछताछ की तो ही सच्चाई सामने आई।

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    सिर्फ फेल्सीपेरम के केस में हो रहा दवाओं का छिड़काव

    तीन साल पहले तक मलेरिया के मरीज मिलने पर उस घर के आसपास के 50 घरों में मच्छर व लार्वा मारने के लिए दवाओं का छिड़काव किया जाता था। आसपास के घरों में फीवर सर्वे कर स्लाइड बनाकर मलेरिया की जांच की जाती थी। अब अमला कम हो गया तो सिर्फ फेल्सीपेरम के केस में मच्छर मारने की दवाओं का छिड़काव किया जा रहा है। स्वास्थ्य विभाग के अफसरों का कहना है कि वाइवेक्स मलेरिया के केस में सिर्फ लार्वा मारने के लिए दवा डाली जाती है।

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    1 लाख की आबादी में डेंगू-मलेरिया रोकने के लिए सिर्फ दो कर्मचारी

    आपको यह जानकार ताज्जुब होगा कि भोपाल शहर की करीब 25 लाख की आबादी में मलेरिया-डेंगू व मच्छरों से होने वाली अन्य बीमारियों को कंट्रोल करने के लिए महज 79 फील्ड वर्कर हैं। पिछले साल 139 कर्मचारी थे। 60 कर्मचारी साल भर में रिटायर हो गए। अगले साल तक लगभग 15 कर्मचारी और रिटायर हो जाएंगे। बता दें कि लार्वा सर्वे व दवाओं का छिड़काव इन्हीं कर्मचारियों के जिम्मे होता है। 79 फील्ड वर्कर में कुछ छुट्टी पर रहते हैं तो कुछ अफसरों के घर में नौकरी कर रहे हैं, इस तरह मलेरिया रोकथाम के लिए 50 कर्मचारी भी नहीं रहते। मलेरिया इंस्पेक्टर्स के 12 पदों में से 4 पदस्थ हैं। इसी तरह से सर्विलांस इंस्पेक्टर्स के 12 पदों में सिर्फ छह पदस्थ हैं।

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    फेल्सीपेरम मलेरिया- समय पर इलाज नहीं किया जाए तो बुखार दिमाग तक पहुंच जाता है, जिससे मरीज की मौत हो जाती है।

    वाइवेक्स- इसमें मरीज की मौत नहंी होती, लेकिन तकलीफ उतनी ही मिलती है।

    इलाज पर खर्च- दोनों तरह के मलेरिया में भर्ती होने की नौबत आती है। इलाज पर खर्च 10 से 15 हजार रुपए होता है।

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    बजट की कमी नहीं है। सभी जिलों को पर्याप्त बजट दिया गया है। हां, अमले की कुछ जिलों में कमी है। फेल्सीपेरम मलेरिया के केस सिर्फ सिंगरौली जिले में मिले हैं।

    डॉ, केएल साहू

    संचालक, स्वास्थ्य

    और जानें :  # maleriya bhopal
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