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    माखन जाटव हत्याकांड में मंत्री लाल सिंह आर्य को नहीं मिली राहत

    Published: Wed, 15 Nov 2017 07:58 PM (IST) | Updated: Thu, 16 Nov 2017 07:31 AM (IST)
    By: Editorial Team
    lalsingh arya 15 11 2017

    ग्वालियर। हाईकोर्ट की एकल पीठ से प्रदेश सरकार के मंत्री लाल सिंह आर्य को राहत नहीं मिल सकी। बुधवार को कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी और कहा कि ऐसा नहीं कहा जा सकता कि उनकी घटनाक्रम में भूमिका नहीं है। तीन गवाहों के बयानों में सामने आया है कि लाल सिंह के उकसाने पर आरोपियों ने विधायक माखन जाटव पर गोली चलाई थी, जो सिर में जाकर लगी। इससे उसकी मौत हुई। हत्याकांड में शामिल होना साफ दिख रहा है। ऐसी स्थिति में उन्हें अग्रिम जमानत का लाभ दिया जाना उचित नहीं है।

    विशेष सत्र न्यायालय भिंड ने गोहद विधायक माखन जाटव हत्याकांड में मंत्री लाल सिंह आर्य को धारा 319 के तहत सह आरोपी बना लिया है। भिंड के न्यायालय ने 25 हजार के जमानती वारंट पर मंत्री आर्य को तलब किया है। अब तक कोर्ट से पांच वारंट जारी हो चुके हैं, लेकिन पुलिस ने तामील नहीं कराए हैं।

    5 दिसंबर को लाल सिंह को विशेष कोर्ट में उपस्थित होना है। जमानती वारंट पर विशेष कोर्ट में उपस्थित होने से बचने के लिए हाईकोर्ट में अग्रिम जमानत याचिका दायर की थी। उनकी ओर से तर्क दिया गया कि हत्याकांड में संलिप्तता नहीं है। राज्य शासन व सीबीआई की जांच में उनका नाम भी नहीं आया है, लेकिन विशेष कोर्ट ने उन्हें सह आरोपी बना लिया है। उनके खिलाफ कोई सबूत नहीं है।

    सीबीआई व राज्य शासन का पक्ष सुनने के बाद गत दिवस हाईकोर्ट ने फैसला सुरक्षित कर लिया था। बुधवार को हाईकोर्ट ने याचिका पर फैसला सुना दिया। हाईकोर्ट ने कहा कि गवाह रनवीर सिंह जाटव, शीला जाटव व बनवारी लाल की गवाही के आधार पर धारा 319 का आवेदन स्वीकार किया है और उनकी गवाही में लाल सिंह का शामिल होना बताया गया है।

    जिस वक्त घटना हुई थी, उस वक्त लाल सिंह आर्य मौके पर थे। उनके कहने पर गोली चलाई गई थी, जो माखन जाटव के सिर में लगी थी और उसकी मौत हुई थी। पूरे मामले में लाल सिंह की संलिप्तता स्पष्ट दिख रही है। ऐसी स्थिति में अग्रिम जमानत का लाभ दिया जाना उचित नहीं है और उनकी याचिका को खारिज कर दिया।

    लाल सिंह के सामने दो विकल्प

    पहला: जिला कोर्ट व हाईकोर्ट में अग्रिम जमानत खारिज होने के बाद सुप्रीम कोर्ट का विकल्प बचा है। सुप्रीम कोर्ट से जमानत नहीं मिलती है तो उन्हें जिला कोर्ट भिंड में उपस्थित होना होगा। अग्रिम जमानत मिल जाती है तो पेशी पर उपस्थित होना होगा।

    दूसरा: लाल सिंह की मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ में एक क्रिमिनल रिवीजन (सीआरआर 883/2017) लंबित है। इस याचिका में धारा 319 के तहत की गई कार्रवाई को चुनौती दी गई है। इस याचिका में विशेष कोर्ट में चल रहे केस को सीबीआई कोर्ट इंदौर स्थानांतरित करने की मांग की गई है। इस याचिका में हाईकोर्ट लाल सिंह के पक्ष में फैसला देता है तो धारा 319 की पूरी कार्रवाई निरस्त हो जाएगी।

    कोर्ट कर सकता है गिरफ्तारी वारंट जारी

    - ग्वालियर के विधि विशेषज्ञ व क्रिमिनल लॉयर मुकेश गुप्ता के अनुसार अगर विशेष सत्र न्यायालय को ऐसा आभास होता है कि वारंट को जानबूझकर नहीं लिया जा रहा है और पुलिस उसे तामील कराना नहीं चाहती है तो ऐसी स्थिति में कोर्ट गिरफ्तारी वारंट जारी कर तलब कर सकता है।

    - श्री गुप्ता के अनुसार धारा 319 में किसी को सह आरोपी बनाया जाता है तो जेल जाने की संभावना अधिक रहती है, क्योंकि हत्या के मामले में तत्काल जमानत मिलने की संभावना कम होती है।

    प्रतिष्ठित व्यक्ति हैं, भागकर नहीं जाने वाले

    मंत्री आर्य की ओर से तर्क दिया गया कि सीबीआई व पुलिस ने इस मामले की जांच की थी। दोनों की जांच में लाल सिंह आर्य का नाम कहीं नहीं आया। वहीं दोनों जांच एजेंसियों ने बनवारी के बयान नहीं लिए हैं। यह केस चलने लायक नहीं है। मंत्री एक प्रतिष्ठित व्यक्ति हैं, कहीं भागकर नहीं जाने वाले और जमानत की शर्तों को पालन किया जाएगा। ट्रायल भी फेस करेंगे।

    बनवारी की गवाही की जरूरत नहीं: सीबीआई

    सीबीआई की ओर से तर्क दिया गया कि बनवारी की गवाही की जरूरत नहीं थी, क्योंकि उसके बयानों पर भरोसा नहीं था। इसलिए गवाही नहीं ली गई। अगर अधिनस्थ न्यायालय को लगता है तो वह गवाही ले सकता है। धारा 319 के तहत फैसला लेने का कोर्ट को अधिकार है। अधीनस्थ न्यायालय ने सही फैसला लिया है।

    आर्य की कोई संलिप्ता नहीं मिली थी:शासन

    शासन की ओर से तर्क दिया गया कि पुलिस की संपूर्ण जांच में कहीं भी लाल सिंह आर्य का जिक्र नहीं आया था। न उनके खिलाफ कोई साक्ष्य मिले थे। हाईकोर्ट ने बनवारी की गवाही को शासकीय अधिवक्ता से पढ़वाया। बनवारी की गवाही में उल्लेख है कि आर्य ने गोली चलाने को कहा था। अंधेरे में किसने गोली चलाई, यह बनवारी को नहीं पता था। उसके अनुसार घटना स्थल पर आर्य मौजूद थे।

    पहली बार है कि एडवोकेट जनरल आरोपी के पक्ष में खड़े

    अदालत से धारा 302 में आरोपी बना व्यक्ति मंत्री पद पर कार्य कर रहा है। साफ सुथरी राजनीति करने वाली बीजेपी ने बेईमानी व बेशर्मी की हद पार कर दी है। यह पहला मौका है कि सीबीआई के वकील व महाधिवक्ता अरोपी के पक्ष में खड़े हैं, जबकि सुप्रीम कोर्ट का डायरेक्शन है कि यह लोग अपराधी के पक्ष में भाग नहीं ले सकते। लाल सिंह को तत्काल बर्खास्त कर गिरफ्तार कराया जाए।

    डॉ. गोविंद सिंह, कांग्रेस, विधायक लहार

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