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    पुणे, बड़ोदरा स्टेशन पर जिस मशीन ने दलालों पर कस दी नकेल, वह हमारे यहां डिब्बा बन गई

    Published: Sun, 17 Sep 2017 10:03 PM (IST) | Updated: Sun, 17 Sep 2017 10:03 PM (IST)
    By: Editorial Team

    ग्वालियर। नईदुनिया प्रतिनिधि

    पुणे, बड़ोदरा, पटना और झांसी जैसे बड़े रेलवे स्टेशनों पर जिस पाम इंप्रेशन मशीन ने टिकट दलालों पर नकेल कस दी। वह मशीन ग्वालियर रेलवे स्टेशन के रिजर्वेशन काउंटर पर सिर्फ डिब्बा बनकर रह गई। रिजर्वेशन काउंटर पर दलाल इस कदर हावी हैं कि मशीन को चलने ही नहीं दिया। इसमें मिलीभगत रही रेलवे स्टाफ की, क्योंकि जब-जब मशीन चली तब-तब रेलवे स्टाफ द्वारा यह कहकर मशीन बंद कर दी गई कि मशीन में तकनीकी खामी है। इसमें रोचक बात यह है कि जिस कंपनी ने पुणे, बड़ोदरा, पटना और झांसी रेलवे स्टेशन पर पाम इंप्रेशन लगाई थी उसी कंपनी ने ग्वालियर रेलवे स्टेशन पर मशीन लगाई। जब ये मशीनें पिछले एक साल से वहां बेहतर काम कर रही हैं तो ग्वालियर रेलवे स्टेशन पर इन मशीनों में तकनीकी खामी कैसे आ जाती है। इस स्थिति के कारण रेलवे को चूना तो लगा, साथ ही एक अच्छी व्यवस्था सफल नहीं हो पाई। जो आम आदमी को राहत देने वाली थी। अगर यह मशीनें चलने लगती तो दलालों का धंधा चौपट हो जाता और आसानी से आम लोगों के टिकट बनते। इतना ही नहीं आम लोगों से दलाल जो अतिरिक्त पैसा वसूलते हैं उन लोगों का पैसा बचता।

    9 लाख रुपए खर्च, एक सप्ताह भी नहीं चली मशीनः

    - ग्वालियर रेलवे स्टेशन पर पाम इंप्रेशन मशीन मिसकॉस कंपनी ने लगाई थीं, इसी कंपनी ने ग्वालियर से पहले झांसी में पाम इंप्रेशन मशीन लगाई।

    - ग्वालियर रेलवे स्टेशन के प्लेटफॉर्म-1 पर दो और प्लेटफॉर्म-4 पर 2 मशीनें लगाईं।

    - इस पर 9 लाख रुपए खर्च हुए।

    - रेलवे ने करीब 90 प्रतिशत भुगतान कंपनी को कर दिया है। कंपनी की सिक्युरिटी मनी अभी रेलवे के पास जमा है, जो करीब डेढ़ लाख रुपए है।

    डीआरएम ने भी किया था उपयोग, स्टाफ ने बता दिया फेलः

    - मशीन पिछले वर्ष सितंबर में इंस्टॉॅल की गई थी।

    - मशीन लगने के बाद इसकी ट्रायल हुई जिसमें कुछ तकनीकी खामी थी। फिर कंपनी ने इसमें अपग्रेडेशन किया।

    - मशीन चालू हुई, मशीन दो दिन चली भी। इस दौरान डीआरएम ने भी मशीन का उपयोग किया था तो बाकायदा टोकन निकल रहे थे।

    - दो दिन बाद ही दलालों ने मशीन को तोड़ने का प्रयास किया, बस इसके बाद मशीन चालू ही नहीं हुई।

    - रेलवे स्टाफ से जब इस बारे में पूछो तो वो लोग कहते हैं कि मशीन में तकनीकी खामी है।

    भुगतान भी हो गया, मशीन भी नहीं चलीः

    रेलवे ने मशीन लगाने वाली कंपनी का भुगतान कर दिया है, लेकिन मशीन चालू नहीं हुई। कंपनी तो मशीन चालू करने को तैयार है, लेकिन रेलवे स्टाफ ही नहीं चाहता कि मशीनें चालू हों। रेलवे अधिकारी भी सबकुछ जानकर अंजान बने हैं।

    अब वारंटी पीरियड भी खत्मः

    मशीन लगाने वाली कंपनी ने मशीनों की एक साल की वारंटी दी थी। मशीन लगाने के एक साल तक कोई भी खराबी आने पर कंपनी इसे सुधारती। मशीन कई महीनों से ऐसी ही पड़ी है, लेकिन रेलवे अधिकारियों ने इसे ठीक नहीं करवाया। अब वारंटी पीरियड भी खत्म हो चुका है।

    कंपनी ने दो बार लिखकर दिया, एक बार भी जवाब नहीं दियाः

    मशीन जब टूटी थी तो उसमें सेफ्टी फीचर्स बढ़ाने के लिए रेलवे अधिकारियों ने कंपनी को बोला था। कंपनी ने दो बार रिपेयरिंग के लिए एस्टीमेट भेजा, लेकिन एक बार भी जवाब नहीं दिया गया।

    जैसे-तैसे पास कराया बिल, अब नहीं करना झांसी मंडल के साथ कामः

    मिसकॉस कंपनी के एक अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि उन्हें झांसी मंडल के सिग्नल एंड टेलीकॉम विभाग के कुछ अधिकारियों ने काफी परेशान किया। हमने मशीन बिलकुल सही लगाकर दी। इसके बाद हम जब भी बिल पास कराने जाते थे तो हमसे रिश्वत मांगी जाती थी। झांसी मंडल ने कुछ और काम करने को बोला था, लेकिन अब हमें झांसी मंडल के साथ काम नहीं करना।

    अगर चालू रहती मशीन तो इस तरह खत्म हो जाते दलालः

    - पाम इंप्रेशन मशीन की खासियत थी कि टिकट तभी बन सकता था जब उसमें टिकट बनवाने वाला अपनी हथेली रखता। हथेली रखने के बाद टोकन निकलता फिर वही टोकन दिखाकर उसका टिकट बनता।

    - एक हथेली के प्रिंट मशीन में फीड हो जाते और उस दिन के लिए प्रिंट मशीन अपने आप ब्लॉक कर देती। इस तरह एक आवेदक एक दिन में एक ही बार टिकट बनवा सकता।

    - अगर कोई आवेदक प्रतिदिन आता तो मशीन उसे पहचान कर दस दिन बाद उसके पाम प्रिंट अपने आप हमेशा के लिए ब्लॉक कर देती। इस तरह अगर कोई रोज-रोज टिकट बनवाता तो वह ब्लॉक हो जाता।

    और जानें :  # railway railway
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