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    कच्चे बिल पर बिक रही दवाएं, एक ड्रग इंस्पेक्टर के भरोसे चार जिले

    Published: Mon, 14 Aug 2017 04:05 AM (IST) | Updated: Mon, 14 Aug 2017 04:05 AM (IST)
    By: Editorial Team

    फ्लैग-जिलेभर में मनमाने तरीके से संचालित हो रहे निजी अस्पताल के मेडिकल

    -डॉक्टरों की लिखी दवाएं मिलती हैं चुनिंदा मेडिकल पर

    फोटो 135 सीहोर। सीएमएचओ कार्यालय

    सीहोर। दवाएं लेने के बाद लोगों को इसका पक्का बिल नहीं मिल रहा है। दरअसल एक ड्रग इंस्पेक्टर के पास चार जिलों का प्रभार है। ऐसे में मेडिकलों की जांच ही नहीं हो पा रही है। इसका फायदा शहर के रिटेलर दवा व्यापारी उठा रहे हैं। उधर दवा दुकानदारों का तर्क है कि यदि कोई ग्राहक 1 हजार तक की दवाई खरीदता है और बिल मांगता है तो उसे दिया जाता है। दिनभर में इक्का-दुक्का ग्राहक बिल लेने वाला आता है। ऐसे में अधिकांश हिसाब कधो कागज पर ही चलता है। दूसरी ओर शहर में जितने भी डाक्टर निजी क्लीनिक चला रहे हैं, उन्होंने अपने मेडिकल खुलवा रखे हैं, जो दवाइयां वे लिखते हैं, वह उनके ही मेडिकल में मिलती हैं। ऐसे में उपभोक्ताओं को मजबूरी में उन्हीं मेडिकल से दवा लेना पड़ती है।

    जानकारी के अनुसार पिछले एक साल से ड्रग इंस्पेक्टर की नियुक्ति नहीं हुई है। जिले का प्रभार किरण मगरे के पास है, जो भोपाल, विदिशा, बैतूल और सीहोर का प्रभार भी देखती हैं। इससे वह शिकायत होने के बाद भी मेडिकल की जांच नहीं कर पाते हैं। इसका मेडिकल संचालक जमकर लाभ उठा रहे हैं। दरअसल शहर में जितने भी डाक्टर हॉस्पिटल खोले गए हैं, सभी ने स्वयं या फिर अपने ही चहेतों के लिए मेडिकल खुलवा लिए हैं। डाक्टर इलाज करते हैं और दवाएं लिखते हैं, वे दवाएं सिर्फ डाक्टर के ही मेडिकल में मिलती हैं, उनका फार्मा बाजार में दूसरी दुकानों पर नहीं मिलता है। ऐसे में मरीजों के सामने परेशानी हो जाती है। उन्हें मजबूरी में बिना बिल के दवाएं लेनी पड़ती हैं। एक शासकीय कर्मचाी ने बताया कि उन्होंने गंगाआश्रम में संचालित एक क्लीनिक से अपने बेटे का इलाज कराया, उन्हें पक्के बिल की जरुरत थी, लेकिन मेडिकल से उन्हें पक्का बिल नहीं दिया गया। मजबूरी उनकी यह थी कि जो दवाएं डाक्टर ने लिखी थीं, वह बाजार में नहीं मिल रही थीं।

    सेल टैक्स की कर रहे चोरी

    एक्सपर्ट सीए के अनुसार ऐसा करने वाले कारोबारी सीधे सेल टैक्स की चोरी कर रहे हैं। क्योंकि पक्का बिल देने से उनके द्वारा की गई सेल काउंट होती है। सादे कागज पर बिल बनाकर देने से एक कारोबारी साल का 20 हजार से ज्यादा का सेल टैक्स बचा लेता है। हालांकि यह उपभोक्ताओं का अधिकार है। उन्हें बिल लेना चाहिए। नहीं मिलता है, तो इस मामले को लेकर शिकायत दर्ज करानी चाहिए। वहीं कुछ मेडिकल संचालकों का कहना है कि जिन दवा विक्रेताओं की सालाना आय 20 हजार से कम है, उन्हें पक्का बिल देने की जरूरत नहीं है।

    बिना रजिस्ट्रेशन के भी चल रहे मेडिकल

    आकड़ों की माने तो जिले में 480 मेडिकल संचालित हो रहे है, लेकिन इन पर न तो डिग्रीधारी पर्चा देखकर दवाएं दे रहे है और न ही इन मेडिकलों के पास खुद का लायसेंस हैं। कई मेडिकल संचालकों ने किराए के लायसेंस ले रखे हैं। वहीं कई मेडिकल बिना रजिस्ट्रेशन के ही संचालित हो रहे हैं। दो माह पहले ही एक निजी क्लिीनिक से बिना रजिस्ट्रेश के मेडिकल संचालित पाए जाने पर उसे सील किया गया था।

    लिखावट नहीं आती समझ में

    हाईकोर्ट के आदेश के बाद भी डॉक्टर कर्सिव राइटिंग में दवाएं लिखते हैं। ऐसे में यदि मेडिकल संचालक मरीज को गलत दवाएं देता है तो वह समझ नहीं सकता। इसके बाद भी डॉक्टर अपने तरीके से ही दवाएं लिखते हैं। वहीं तय मेडिकलों पर दवाएं मिलने से डॉक्टरों का कमिश्न भी तय रहा है। यही कारण है कि दूसरे मेडिकलों में दवाएं भी नहीं मिलती हैं।

    नहीं है बिल देना संभव

    एक नामी मेडिकल संचालक ने बताया कि यदि कोई ग्राहक एक पेन किलर का पत्ता खरीदता है, तो उसे बिल देना संभव नहीं है। साथ ही कोई ग्राहक बिल की डिमांड भी नहीं करता है, जो करते हैं उन्हें बिल बनाने में समय लग जाता है। जरुरत पड़ने पर देते भी हैं।

    शिकायत मिलने पर करता हूं जांच

    मेरे पास चार जिलों का प्रभार है। जब कहीं से शिकायत मिलती है, तो जाकर कार्रवाई करता हूं। करीब दो माह पहले बिना रजिस्ट्रेश के मेडिकल संचालन पर सिटी केयर हास्पिटल का स्टोर्स सील किया था।

    किरण मगरे, ड्रग इंस्पेक्टर, प्रभारी सीहोर

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