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    'अपने कर्म करके उसे भूलकर ईश्वर को अर्पण कर दो'

    Published: Mon, 18 Sep 2017 12:26 AM (IST) | Updated: Mon, 18 Sep 2017 12:26 AM (IST)
    By: Editorial Team

    सात दिवसीय गीता ज्ञान यज्ञ के समापन पर गीता दीदी ने दिए प्रवचन

    फोटो 13, 14

    सिवनी। नईदुनिया प्रतिनिधि

    श्रीमद्भगवत गीता में परमात्मा श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा अभ्यास से ज्ञान श्रेष्ठ है। इसलिए ज्ञान को समझो। ज्ञान से ध्यान श्रेष्ठ है और ध्यान से सर्व कर्म फल का त्याग श्रेष्ठ है। जो कर्म करो उसे भूल जाओ, समर्पण कर दो ईश्वर को अर्पण कर दो, ये फल भी तुम्हें अर्पण। कर्म का जो भी फल मिलता है, सब मुझको अर्पण कर दो। हे अर्जुन कर्म फल के त्याग से तत्काल ही शांति प्राप्त हो जाती है। इस प्रकार जब तुम्हारे अंदर की आसक्ति खत्म हो जाएगी तो मन शांत हो जाएगा। इस आशय का उद्गार ब्रह्माकुमारी संस्थान की गीता दीदी ने बालाजी नगर स्थित बालाजी लॉन में आयोजित सप्त दिवसीय गीता ज्ञान यज्ञ के समापन अवसर पर व्यक्त किए।

    जो मित्रता का भाव रखता है वह कृपालू है

    उन्होंने आगे कहा कि जो किसी से द्वेष नहीं करता और सर्व के प्रति मित्रता भाव रख कृपालू है, वह भगवान को प्रिय है। जो ममत्व बुद्धि और अहंकार रहित है, वह आत्मा भगवान को प्रिय है। जो सदा संतुष्ट, दृढ़ और संयमी है वह भगवान की अति प्रिय आत्मा है। जो समर्पण बुद्धि और कर्मयोगी है, जो ईर्ष्या, भय और विषाद इन दुर्गुणों से अलिप्त है, वही भगवान को अति प्रिय है। जो मनुष्य ईश्वर में मन को एकाग्र नहीं कर सकता उसे योगाभ्यास करना चाहिए क्योंकि जितनी शारीरिक एकाग्रता होगी उतना मन को एकाग्र करना सहज हो जाएगा। अनेक आत्माओं का जीवन शुद्ध बनाने की प्रेरणा देना यह सबसे बड़ी सेवा है। किसी को आत्म उन्नति का मार्ग बताना यह सबसे बड़ी सेवा है। इस प्रकार की सेवा करने के लिए सभी मनुष्यात्माओं को अवश्य समय निकालना चाहिए।

    वह सदैव दूषित संगति से मुक्त रहता है

    उन्होंने बताया कि जिस व्यक्ति के मन में किसी प्रकार की आसक्ति नहीं रहती वह मितभाषी और दूषित संगति से सदैव मुक्त रहता है। क्योंकि वह शत्रु मित्र, मान-अपमान, सुख-दुःख, निंदा-स्तुति में समान एवं क्षमाशील हो जाता है। वह धर्ममय अमृत पथ का श्रद्धा से अनुसरण करते रहता है। इसलिए जितना हो सके इन लक्षणों से अपने जीवन को विकसित करते जाएं।

    गीता योग शास्त्र है

    आशीर्वचन के रुप में उपस्थित ज्योति दीदी ने कहा कि गीता हमें अहिंसा परमो धर्म की प्रेरणा देती है। गीता वास्तव में योग शास्त्र है। युद्ध शास्त्र नहीं। योग ध्यान ही गीता का सच्चा धर्म है। आज हमें अपने सत्य स्वरुप की पहचान न होना ही अनेक प्रकार के दुःखों का मूल कारण है। जिनके जीवन में मन, वचन एवं कर्म की प्रवित्रता है। उनका जीवन सुख-शांति संपन्न बन जाता है। अंत में उपस्थित सभी श्रद्धालुओं ने अपने अंदर के बुराइयों को समाप्त करने का संकल्प लिखकर निर्मित हवन कुंड में बुराइयों को स्वाहा किया।

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