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    रेशम की खेती से बदली जिंदगी, मजदूर से बन गए लखपति

    Published: Sun, 19 Mar 2017 08:25 PM (IST) | Updated: Tue, 21 Mar 2017 03:20 PM (IST)
    By: Editorial Team
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    बालाघाट। नक्सल प्रभावित गांव जहां कभी दहशत और रोजगार के अभाव में ग्रामीण रहना पसंद नहीं करते थे। अब उस गांव को छोड़कर बाहर नहीं जा रहे हैं। यह हाल है आदिवासी बाहुल्य दक्षिण बैहर में बसे धुनधुनवर्धा गांव का। रेशम की खेती ने इनकी तकदील बदल दी और गांव से पलायन भी थम गया है।

    ये लोग कभी रोजगार की तलाश में हैदराबाद, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र और दिल्ली जाते थे लेकिन अब आसपास के ग्रामीणों को रोजगार दे रहे हैं। ग्रामीण परंपरागत खेती से हटकर रेशम का उत्पादन कर रहे हैं। इस गांव के 60 परिवार में से 36 रेशम की खेती कर रहे हैं। रेशम की खेती करने वाल हर किसान एक साल में एक एकड़ डेढ़ लाख से ज्यादा का मुनाफा कमा रहा है। ये ग्रामीण 3 साल से रेशम की खेती कर रहे हैं।

    रोल मॉडल बने ग्रामीण

    धुनधुनवर्धा के ग्रामीण जिले के अन्य आदिवासी किसानों के लिए रोल मॉडल बन गए हैं। उनकी मेहनत और लगन से आगे बढ़े रेशम के उत्पादन से प्रभावित होकर ग्रामीण रेशम विभाग की मदद से इसकी खेती करने लगे हैं। आसपास के 10 गांवों में रेशम की खेती होने लगी है।

    ऐसे करते हैं खेती

    रेशम के उत्पादन के लिए किसान सालभर शहतूत की देखभाल करते हैं। फिर इसके पत्ते खिलाकर रेशम के कीड़ों का पालन करते हैं। यह प्रक्रिया जटिल नहीं है, लेकिन कृमिपालन करना बेहद तकनीक का काम है। इसे अलग-अलग समय में अलग-अलग तरीके से किया जाता है। गर्मी में कृमि पालन के ठंडक व ठंडी में गर्माहट का इंतजाम करना पड़ता है। अकेले बारिश को छोड़ दें तो सालभर इनकी भी देखभाल करनी पड़ती है।

    कोकून बनने का पीरियड

    -अगस्त-नवंबर तक तीन फसल ली जाती है।

    - फरवरी से अप्रैल-मई तक 4 फसल ली जाती हैं।

    कोकून का उत्पादन

    -1 एकड़ में 100 डीएफएल निकलता है जिसमें 45-50 किलो कोकून निकलता है।

    -300 रुपए प्रति किलो की दर से रेशम विभाग इनसे खरीदता है।

    -एक फसल में 30 हजार का उत्पादन।

    -एक साल में 7 फसल लेते हैं किसान।

    ऐसे बनता है कोकून

    कीड़े जितना शहतूत की पत्तियों को खाएंगे, उतना ही बेहतर और ज्यादा कोकून तैयार होगा। एक कीड़े से 50 से 100 कोकून तैयार होते हैं। एक माह में कोकून तैयार हो जाता है। कोकून बनाने वाले कीड़ों को 3 वक्त खुराक दी जाती है। ये दिन में तीन बार पत्तियां खाते हैं।

    नक्सल प्रभावित गांवों में जगी रोजगार की उम्मीद

    धुनधुवर्धा में 36 किसानों को देखकर डाबरी में किसानों ने 12 एकड़, इक्का में 6 एकड़, शुक्लपाठ में 6 एकड़ व कोदापार में 3 एकड़, तुम्मा में 3 एकड़, लातरी, भंडेरी, कुल्पा, चालीसबोड़ी व सोनेवानी में किसानों ने रेशम का उत्पादन करने के लिए शहतूत की खेती शुरु कर दी है।

    बंजर जमीन से उत्पादन धुनधुनवर्धा की समरत अब रोजगार की तलाश में गांव छोड़कर बाहर नहीं जाती है। अब वह अपने खेत में काम करती है और लोगों को भी काम दे रही है। सरिता मसराम का कहना है जब से रेशम की खेती से अब अच्छा मुनाफा हो रहा है। पहले कोदो कुटकी से पेट भरने को भी अनाज नहीं हो पाता था। अब सरकारी मदद से बंजर जमीन में उत्पादन कर पा रहे हैं।

    नक्सल प्रभावित गांव में लोग काफी लगन से मेहनत कर रहे हैं जिससे रेशम का उत्पादन बढ़ रहा है। लाभ अच्छा होने से किसान आगे आ रहे हैं। अब धुनधुनवर्धा के ही नहीं आसपास के 10 गांवों के और किसान रेशम की खेती करने लगे हैं। सरकारी योजना से उन्हें कीड़े और शहतूूत पौधे से लेकर शेड निर्माण की लिए भी मदद दी जाती है। उनके लिए यह बिना लागत का उत्पादन है। उन्हें मजदूरी से कई गुना ज्यादा मुनाफा हो रहा है। एक साल में ही इसकी खेती कर आदिवासी किसान लखपति बन गए हैं। - डीपी सिंह, रेशम अधिकारी।

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