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    स्टीफन हॉकिंस से मिलती है शहर की स्वस्ति की कहानी

    Published: Fri, 17 Feb 2017 01:54 PM (IST) | Updated: Fri, 17 Feb 2017 05:42 PM (IST)
    By: Editorial Team
    swasti wagh indore 2017217 14632 17 02 2017

    इंदौर, लाइव रिपोर्टर। मशहूर भौतिक शास्त्री स्‍टीफन हॉकिंस की तरह मैं भी एक दुर्लभ बीमारी से पीड़ि‍त हूं। 16 साल तक मैं एक आम लड़की की जिंदगी जी रही थी। इसके बाद वक्त ने कुछ ऐसी करवट ली जिसके बारे में मैंने या घरवालों ने कभी सोचा भी नहीं था। एक-एक कर मेरे बॉडी ऑर्गन जवाब देने लगे। डॉक्टर्स ने बताया कि मैं फ्रीडीच एटैक्सिया (एफआरडीए) नामक दुर्लभ बीमारी से ग्रस्त हूं। ये एक न्यूरोडिजनरेटिव डिसऑर्डर है। जिसमें मरीज के अंग धीरे-धीरे काम करना बंद करने लगते हैं।

    इसका शुरुआती असर हाथों-पैरों पर पड़ा। उसके बाद धीरे-धीरे शरीर के भीतर के ऑर्गन्स भी ब्रेन के ऑर्डर समझने में नाकामयाब होने लगे। इन तमाम विपरीत परिस्थितयों के बावजूद मैंने पढ़ाई जारी रखी। एसजीएसआईटीएस से अप्लाइड मैथेमैटिक्स में एमएससी किया।

    उसके बाद मैं अपने अनुभवों और इंटरनेट के जरिए उसी बीमारी पर स्टडी करने लगी, जिसने मेरी जिंदगी बदलकर रख दी थी। पैरेंट्स की वजह से मैं तो इस बीमारी के साथ सर्वाइव कर गई मगर ये बिलकुल नहीं चाहती कि अब आगे किसी को ये बीमारी हो। क्योंकि ये सब बहुत तकलीफदेह होता है।

    ये आपबीती है जोश और जज्बे से लबरेज युवती स्वस्ति वाघ की जो गंभीर बीमारी से ग्रस्त होने के बावजूद किसी भी कीमत पर हिम्मत हारने को तैयार नहीं है। इसी बीमारी के बारे में अपनी जानकारियां साझा करने के लिए उसे इंटरनेशनल कॉफ्रेंस ऑन नैनोमटेरियल एंड नैनोटेक्नोलॉजी में शिरकत करने के लिए बुलाया गया है। जनरल 'अल्ट्रा साइंटिस्ट फॉर फिजिकल साइंस' द्वारा भी उसके कार्य को स्वीकारोक्ति दी गई है।

    पैरेंट्स को बोलकर लिखवाती है नोट्स

    स्वस्ति की मां सुधा बताती हैं कि अब उसकी बीमारी ऐसे दौर में पहुंच गई है जहां उसका लिखना-पढ़ना भी दूभर होता जा रहा है। कुछ समय पहले तक वो ट्यूशन पढ़ाती थी मगर बीमारी बढ़ जाने के कारण उसका वो काम भी बंद हो गया है। आंखों के रेटिना भी डिटैच होने लगे हैं।

    मगर इन परिस्थितियों में भी उसका हौसला कम नहीं हुआ है। अब वो अपने नोट्स मेरे और अपने पापा दिवाकर वाघ को लिखवाकर तैयार करती है। अभी हमारी चिंता उसे मैड्रिट (स्पेन) में हो रही इंटरनेशनल कांफ्रेंस में भेजने को लेकर है। क्योंकि मध्यमवर्गीय परिवार होने के कारण हमें नहीं लगता कि हम इतना बड़ा खर्च उठा सकेंगे।

    डीएनए जांच के बाद पता चली बीमारी

    स्वस्ति की बीमारी की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि लंबे अरसे तक उसे डाग्नोसिस ही नहीं किया जा सका था। बाद में न्यूरोसर्जन डॉ. अपूर्व पुराणिक की मदद से एम्स के डॉक्टरों ने डीएनए के जरिए इस बीमारी का पता चला। मां सुधा बताती हैं कि स्वस्ति की एक बड़ी और छोटी बहन है। वो दोनों पूरी तरह स्वस्थ हैं।

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