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    इस प्राचीन वट वृक्ष को मुगलों ने कई बार तबाह करना चाहा, लेकिन रहे नाकाम

    Published: Fri, 14 Jul 2017 10:25 AM (IST) | Updated: Fri, 14 Jul 2017 09:15 PM (IST)
    By: Editorial Team
    siddhavat temple ujjain 14 07 2017

    उज्जैन । हिंदू मान्यता के अनुसार चार वट वृक्षों का महत्व अधिक है। उज्जैन स्थित सिद्धवट मंदिर लेकर ऐसी धार्मिक मान्यता है कि जब माता पार्वती ने यहां तपस्या की थी, तब उन्होंने ही इस सिद्धवट को लगाया था। गौरतलब है कि उज्जैन का सिद्धवट भी प्रयाग के अक्षयवट, वृन्दावन के वंशीवट और नासिक के पंचवट के समान अपनी पवित्रता के लिए प्रसिध्द है।

    ऐसा माना जाता है कि पवित्र नदी शिप्रा के तट पर स्थित सिध्दवट घाट पर अन्त्येष्टि-संस्कार सम्पन्न किया जाता है। स्कन्द पुराण में इस स्थान को प्रेत-शिला-तीर्थ कहा गया है। इसके अलावा नाथ संप्रदाय में भी इसे पूजा का स्थान माना गया है। मुगल शासन काल में इस सिद्धवट को नष्ट करने के कई बार प्रयास किए गए थे।

    पुरातात्विक दृष्टिकोण से भी उज्जैन का सिद्धवट मंदिर काफी महत्व रखता है क्योंकि शिप्रा के तट पर स्थित मंदिर के पास नदी में बड़ी तादाद में कछुए पाए जाते हैं। इसके अलावा उज्जैन से प्राप्त हुए प्राचीन सिक्कों में भी नदी के साथ कछुओं के चित्र अंकित किए हुए मिले हैं।

    ऐसे में इस धारणा को बल मिलता है कि यहां कछुए प्राचीन काल से ही रहे होंगे। उज्जैन के भैरवगढ़ के पूर्व में शिप्रा नदी के तट पर स्थित सिद्धवट को शक्तिभेद तीर्थ के रूप में भी जाना जाता है।

    ऐसी मान्यता है कि यहां संतति, संपत्ति और सदगति जैसी तीन तरह की सिद्धि प्राप्त करने के लिए पूजन किया जाता है। इसके अलावा यहां पितरों के लिए अनुष्ठान किया जाता है।

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