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    ब्राह्मण चेहरे पर सहमति नहीं बनने से निकली राजबब्बर की लॉटरी

    Published: Wed, 13 Jul 2016 01:21 AM (IST) | Updated: Wed, 13 Jul 2016 02:53 PM (IST)
    By: Editorial Team
    rajbabbar 13 07 2016

    संजय मिश्र : नई दिल्ली। उप्र कांग्रेस की कमान ब्राह्ममण चेहरे को सौंपने की पार्टी के मुख्य चुनाव रणनीतिकार प्रशांत किशोर की रणनीति धराशायी हो गई है। ब्राह्ममण चेहरे के नाम पर सहमति नहीं बन पाने के कारण राजबब्बर को उप्र कांग्रेस का अध्यक्ष बनाकर पार्टी ने प्रदेश के चुनावी समर में कूदने का फैसला किया है।

    इस तरह उप्र के संग्राम में राजनीतिक सियासी समीकरण गढ़ने की प्रशांत किशोर की रणनीति के मुकाबले राजबब्बर का स्टार पावर हाईकमान को ज्यादा मुफीद लगा है।

    हालांकि चार वरिष्ठ उपाध्यक्षों की नियुक्ति कर हाईकमान ने जातीय समीकरणों को भी साधने की कोशिश की है। उप्र के चुनाव में भूमिका निभाने की तैयारी कर रहीं प्रियंका गांधी ने भी राजबब्बर को कमान सौंपने पर मुहर लगा दी। हालांकि भविष्य में चुनाव अभियान समिति का चेहरा ब्राह्ममण को बनाने का विकल्प खुला है।

    पार्टी के विश्र्वस्त सूत्रों के अनुसार शीला दीक्षित, जितिन प्रसाद और राजेश मिश्रा सरीखे ब्राह्ममण चेहरों के नामों पर खूब चर्चा हुई। शीला दीक्षित को संगठन की कमान देना इसलिए मुनासिब नहीं समझा गया क्योंकि उप्र कांग्रेस के निचले स्तर तक उनका कोई खास संवाद नहीं है। जितिन प्रसाद की दावेदारी गंभीर जरूर रही मगर आक्रामक राजनीति की मौजूदा जरूरत के मद्देनजर उनकी सौम्यता ही उनके आड़े आ गई। तो राजेश मिश्रा की उम्मीदवारी को भी मौजूदा चुनावी परिदृश्य में मुफीद नहीं आंका गया।

    उन्हें वरिष्ठ उपाध्यक्ष बनाकर ब्राह्ममणों को संदेश देने की कोशिश भी की गई है। गुलाम नबी आजाद ने उप्र के सियासी समीकरणों पर मंथन के बाद हाईकमान को इस बात के लिए राजी कर लिया कि सपा, बसपा और भाजपा की आक्रामक राजनीति को देखते हुए राजबब्बर ही बेहतर चेहरा होंगे। प्रियंका गांधी ने मंगलवार को प्रदेश के प्रभारी वरिष्ठ नेता गुलाम नबी आजाद के घर जाकर घंटे भर की लंबी चर्चा की। इसके बाद ही शाम को आजाद ने बब्बर के नाम का एलान कर दिया।

    राजबब्बर के पक्ष में यह भी तर्क काम कर गया कि उनकी एक स्टार पावर अपील है और उप्र में वह अनजाना चेहरा नहीं हैं। खत्री समुदाय से ताल्लुक रखने वाले बब्बर सभी वर्गों को कांग्रेस की ओर जोड़ने की क्षमता रखते हैं। वैसे दलित, ओबीसी और अल्पसंख्यक समुदाय के नामों पर भी विचार हुआ। लेकिन सपा और बसपा के कोर राजनीतिक वोट बैंक को देखते हुए इस चुनाव में ऐसे प्रयोग से बचने को ही सही माना गया है।

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