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    क्या है साहित्यकारों का नजरियाः बाजार, तकनीक और हिंदी की स्थिति

    Published: Thu, 14 Sep 2017 09:33 AM (IST) | Updated: Thu, 14 Sep 2017 11:10 AM (IST)
    By: Editorial Team
    writers 14 09 2017

    नई दिल्ली। हिंदी दिवस पर एक बार फिर इसके महत्व और जरूरत को लेकर बात हो रही है। जानिए साहित्यकारों का हिंदी को लेकर नजरिया किस तरह बदला है।

    बाजार ने बढ़ाया हिंदी सॉफ्टवेयर

    भारतीय भाषाओं को खत्म करने का षड्‌यंत्र हम स्पष्ट देख सकते हैं। जिस प्रकार अफ्रीकी देशों में स्थानीय भाषाओं को खत्म किया गया, वह हमारे सामने है। हमारे यहां भी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया हो या फिर प्रिंट मीडिया, हिंदी के शब्द सहज उपलब्ध होने के बावजूद इनमें अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग बढ़ता ही जा रहा है। हां, यह जरूर संतोष का विषय है कि हिंदी के व्यापक बाजार को देखते हुए अब कई सॉफ्टवेयर हिंदी के लिए बन रहे हैं। मगर हिंदी को बढ़ावा देने का काम केवल इसके व्यापक बाजार तक पहुंचने की गरज से हो रहा है। अंग्रेजी का प्रभुत्व बढ़ना जारी है। हिंदी की ताकत उसे बोलने वालों में ही है। हिंदी बोलिए

    - राजेश जोशी (वरिष्ठ कवि)

    नई तकनीक के साथ चलें

    भावनात्मक रूप से किसी भाषा से जुड़ा होना एक बात है मगर यदि वह भाषा कमाई का साधन नहीं बन सकती, तो वह व्यापक भाषा नहीं बन पाती। अंग्रेजी का वर्चस्व इसीलिए स्थापित हुआ कि यह रोजगार की भाषा बनी। नई तकनीक के साथ चलना भी भाषा के लिए जरूरी है। आजके इलेक्ट्रॉनिक युग में हिंदी को लेकर फॉण्ट की समस्या आती है, जो कि अंग्रेजी में बिल्कुल नहीं आती। भाषा को भ्रष्ट होते हुए भी हम अपने चारों ओर देख सकते हैं। फिर चाहे दुकानों आदि पर लगे गलत हिज्जों वाले सूचना पट्ट हों या फिर आपसी बोलचाल की खिचड़ी भाषा। छोटे-छोटे कामों से ही हिंदी बची रहेगी।

    - मृदुला गर्ग (वरिष्ठ साहित्यकार)

    भूमंडलीकरण ने बदली भाषा

    हिंदी के साथ मध्यवर्ग ने बहुत बड़ा विश्वासघात किया है। इस शिक्षित व संपन्न वर्ग ने अंग्रेजी के पक्ष में हिंदी को छोड़ दिया है। भूमंडलीकरण के दौर में हमारी जीवनशैली के साथ-साथ भाषा भी बदल गई है। संकट में हिंदी ही नहीं, अन्य भारतीय भाषाएं भी आ गई हैं। पहले गर्व से हिंदी में शोध आदि करने वाले भी अब अंग्रेजी के पक्ष में जा खड़े हुए हैं। इधर हिंदी को राजभाषा बनाने के आग्रह ने अन्य भारतीय भाषाओं से इसकी दूरी बढ़ाई है। इसे अंतरराष्ट्रीय भाषा या संयुक्त राष्ट्रसंघ की भाषा बनाने का अव्यवहारिक स्वप्न देखना भी हमें छोड़

    देना चाहिए, क्योंकि उससे हिंदी का कुछ भी भला नहीं होने वाला है।

    - अशोक वाजपेयी, आलोचक

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