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    अयोध्या आस्था का सवाल, बातचीत से निकालें हल

    Published: Tue, 21 Mar 2017 11:09 AM (IST) | Updated: Tue, 21 Mar 2017 09:23 PM (IST)
    By: Editorial Team
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    नई दिल्ली। अदालत की चौखट पर वर्षों से अटके राम जन्मभूमि विवाद का अदालत के बाहर हल होने की संभावनाएं जगी हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इसे संवेदनशील और आस्था से जुड़ा बताते हुए पक्षकारों से बातचीत कर मसले का हल आम सहमति से निकालने को कहा है।

    अगर जरूरत पड़ी तो सुप्रीम कोर्ट हल निकालने के लिए मध्यस्थता को भी तैयार है। यह टिप्पणी मंगलवार को मुख्य न्यायाधीश जेएस खेहर, न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति संजय किशन कौल की पीठ ने भाजपा नेता सुब्रह्माण्यम स्वामी की राम जन्मभूमि विवाद मामले की जल्द सुनवाई की मांग पर की।

    स्वामी ने कोर्ट से कहा कि मामला छह वर्षों से लंबित है। इस पर रोजाना सुनवाई कर जल्द निपटारा करना चाहिए। स्वामी ने बताया कि उन्होंने मुस्लिम समुदाय के सदस्यों से बात की थी और उन्होंने कहा था कि इस मामले को हल करने के लिए न्यायिक हस्तक्षेप की जरूरत है।

    कोर्ट का सुझाव

    मुख्य न्यायाधीश खेहर ने स्वामी से कहा, "सर्वसम्मति से किसी समाधान पर पहुंचने के लिए आप नए सिरे से प्रयास कर सकते हैं। अगर जरूरत पड़ी तो आपको इस विवाद को खत्म करने के लिए कोई मध्यस्थ भी चुनना चाहिए।

    अगर पक्षकार चाहें कि मैं दोनों पक्षों द्वारा चुने गए मध्यस्थों के साथ बैठूं तो इसके लिए तैयार हूं। यहां तक कि इस उद्देश्य के लिए मेरे साथी जजों की सेवाएं भी ली जा सकती हैं।" शीर्ष अदालत ने कहा कि अगर दोनों पक्ष चाहें तो वह मुख्य वार्ताकार भी नियुक्त कर सकती है। इसके बाद पीठ ने स्वामी से कहा कि वे सभी पक्षों से सलाह करें और 31 मार्च को अगली तारीख पर फैसले के बारे में सूचित करें।

    "संबंधित पक्षकारों को आपसी सहमति से इसका हल निकालना चाहिए। कोर्ट तो आखिरी उपाय होना चाहिए। अदालत तभी बीच में आएगी जब पक्षकार बातचीत से मामला न निपटा पाएं। - जस्टिस जेएस खेहर, मुख्य न्यायाधीश

    क्या है मामला

    इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ पीठ ने 2010 में राम जन्मभूमि विवाद में फैसला सुनाते हुए अयोध्या में जमीन को तीनों पक्षकारों यानी रामलला विराजमान, निर्मोही अखाड़ा और सुन्नी वक्फ बोर्ड में बराबर-बराबर बांटने का आदेश दिया था। हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ सभी पक्षकारों ने सुप्रीम कोर्ट में अपीलें दाखिल कर रखी हैं जो कि पिछले छह साल से लंबित हैं। सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के आदेश पर रोक लगाते हुए मामले में फिलहाल यथास्थिति बनाए रखने के आदेश दे रखे हैं।

    लेकिन सहमत नहीं पक्षकार

    1-हिंदू महासभा

    हिंदू महासभा के वकील हरिशंकर जैन का कहना है कि समझौते का सवाल ही नहीं उठता क्योंकि जमीन रामलला विराजमान की है। जमीन देवता में सन्निहित होती है, इसलिए देवता की जमीन का समझौता कोई व्यक्ति या संगठन नहीं कर सकता। उनका कहना है कि पहले भी पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर और वीपी सिंह के कार्यकाल में वार्ता के दौर चले लेकिन यह सफल नहीं हो पाया।

    2-इकबाल अंसारी

    पक्षकार हाशिम अंसारी के पुत्र इकबाल अंसारी के वकील एमआर शमशाद का कहना है कि किसी भी दीवानी मुकदमे में कोर्ट के बाहर समझौते से मामला सुलझाने का विकल्प रहता है। लेकिन अगर कहा जाए कि मस्जिद के लिए कहीं और जमीन ले ली जाए, तो इसे समझौता नहीं कहा जा सकता।

    3-निर्मोही अखाड़ा

    निर्मोही अखाड़ा के वकील सुशील जैन का कहना है कि सुब्रह्माण्यम स्वामी अयोध्या जन्मभूमि मामले में पक्षकार नहीं हैं और उन्होंने बिना किसी पक्षकार को सूचित किए कोर्ट में केस मेंशन कर दिया है। जैन का कहना है कि उन्हें कोर्ट की टिप्पणीं के बारे में कुछ नहीं मालूम। ऐसे में वे उस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं देंगे।

    4-जमीयत-ए-उलेमा-ए हिंद

    जमीयत-ए-उलेमा-ए हिंद के अध्यक्ष मौलाना सैयद अरशद मदनी का कहना है कि अदालत के बाहर मामले को हल करने का सुप्रीम कोर्ट का सुझाव स्वीकार योग्य नहीं है। पहले भी छह-सात बार ऐसी कोशिश की जा चुकी है पर हर बार नाकाम हुई। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का जो भी फैसला होगा, वह मंजूर होगा।

    किसको कैसा लगा "सुप्रीम" सुझाव

    "सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी स्वागतयोग्य है। दोनों पक्षों को मिल-बैठकर ही इसका फैसला करना चाहिए। उत्तर प्रदेश सरकार इस मामले में हरसंभव मदद के लिए तैयार है।" - योगी आदित्यनाथ, मुख्यमंत्री, उप्र

    "यदि सीजेआई खुद मध्यस्थता करते हैं या सुप्रीम कोर्ट के जजों की टीम को मनोनीत करते हैं या कोर्ट खुद सुनवाई करता है तो हमें उन पर विश्वास है। लेकिन हम कोर्ट के बाहर कोई समझौता स्वीकार करने के इच्छुक नहीं हैं। - जफरयाब जिलानी, संयोजक, बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी

    "इसका फैसला धर्म संसद द्वारा किया जाना चाहिए क्योंकि वे ही लोग हैं, जिन्होंने राम जन्मभूमि आंदोलन को संगठित किया और पक्षकार बनकर कोर्ट पहुंचे। संघ धर्म संसद के फैसले के साथ जाएगा।" - दत्तात्रेय होसबोले, आरएसएस नेता

    "कृपया यह याद रखें कि बाबरी मस्जिद केस टाइटल (मालिकाना हक) का है, जिस पर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने पार्टनरशिप केस की तरह गलत तरीके से फैसला किया था।" - असदुद्दीन ओवैसी, अध्यक्ष, एआईएमआईएम

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