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    OROB पर भारत के पक्ष में खुल कर आया अमेरिका, चीन- पाक में खलबली

    Published: Thu, 12 Oct 2017 07:53 PM (IST) | Updated: Thu, 12 Oct 2017 08:15 PM (IST)
    By: Editorial Team
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    नई दिल्ली। 27 जून, 2017 को वाशिंगटन में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मुलाकात के बाद जारी संयुक्त घोषणा पत्र में पहली बार चीन की वन बेल्ट वन रोड (ओबोर- नया नाम बेल्ट एंड रोड इनिसिएटिव-बीआरआइ) को लेकर भारत की चिंताओं का समर्थन किया गया था।

    अब अमेरिका ने यह साबित कर दिया है कि वह समर्थन सिर्फ प्रधानमंत्री मोदी की राजकीय यात्रा को देखते हुए नहीं था, बल्कि यह ट्रंप प्रशासन की सोची समझी कूटनीति का हिस्सा था। यही वजह है कि अमेरिका के रक्षा मंत्री जेम्स मैटिस ने सेना से जुड़ी सीनेट की रक्षा समिति के सामने यह बयान दिया है कि चीन की ओबोर परियोजना एक विवादित भौगोलिक स्थान से गुजर रही है जिसको लेकर अमेरिका चिंतित है।

    वैसे इस बयान का चीन ने कड़ा विरोध किया है और पाकिस्तान में भी इस पर जबरदस्त हंगामा मचा हुआ है। पाकिस्तान में तो इस बात पर बहस छिड़ गई है कि इस बयान से अमेरिका ने यह साफ कर दिया है कि उसकी कश्मीर नीति भारत के पक्ष में बदल रही है। अमेरिका ने परोक्ष तौर पर गिलगिट बाल्टिस्तान के विवादित होने के भारत के दावे का समर्थन किया है।

    दूसरी तरफ भारत का मानना है कि यह पूरी तरह से वैश्विक कनेक्टिविटी परियोजनाओं पर भारत के रुख का समर्थन है। विदेश मंत्रालय के सूत्रों का कहना है कि अमेरिकी रक्षा मंत्री ने सिनेट की जिस समिति के सामने यह बयान दिया है वह बेहद महत्वपूर्ण है। यह बयान बताता है कि भारत के साथ द्विपक्षीय वार्ताओं में अमेरिका ने इस पूरे मुद्दे पर जो रुख अपनाया था उसे वह आंतरिक तौर पर भी स्वीकार करता है।

    वैसे चीन को अमेरिकी रक्षा मंत्री का यह बयान नागवार गुजरा है। लेकिन सूत्रों की मानें तो ओबोर या बीआरआइ को लेकर उसे और कड़े संकेत मिलेंगे। इस महीने के अंत तक अमेरिका के विदेश मंत्री रेक्स टिलरसन भारत दौरे पर आने वाले हैं। इस दौरान विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के अलावा अन्य वरिष्ठ नेताओं से मुलाकात होगी। यह दो महीने के भीतर स्वराज व टिलरसन की दूसरी मुलाकात होगी।

    माना जा रहा है कि इन दोनों के बीच होने वाली बैठक में ओबोर भी एक मुद्दा रहेगा। इसकी एक वजह यह बताई जा रही है कि अमेरिका ओबोर के माध्यम से मध्य पूर्व या केंद्रीय एशियाई देशों में चीन की बढ़ती पहुंच को बहुत पसंद नहीं करता है।

    सीनेट के सामने अमेरिकी रक्षा मंत्री ने यह कहा है कि अमेरिका विभिन्न देशों के बीच बढ़ते संपर्क का हिमायती है लेकिन वह किसी एक देश के वर्चस्व के खिलाफ है। इसके साथ ही उन्होंने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि इस योजना के पाकिस्तान के गिलगिट-बाल्टिस्तान से गुजरने को लेकर भारत की चिंताएं जायज है।

    सनद रहे कि मोदी और ट्रंप की जून, 2017 में हुुई बैठक के बाद जारी बयान में पहली बार अमेरिका ने चीन की ओबोर परियोजना पर भारत के रुख का समर्थन किया था। इसमें कहा गया था कि दोनों देश आर्थिक तौर पर क्षेत्रीय कनेक्टिविटी की योजनाओं का समर्थन करते हैं। लेकिन यह योजना पारदर्शी तरीके से और दूसरे देशों की सार्वभौमिकता व क्षेत्रीय अखंडता का आदर करते हुए होनी चाहिए।

    इससे पहले भारत ओबोर का यह कहते हुए विरोध करता है कि वह जम्मू एवं कश्मीर के उस हिस्से से गुजरेगा जिस पर पाकिस्तान ने कब्जा कर रखा है।

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