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    नागार्जुन ने ऐसी कविता लिखी कि मिलने लग गई छात्रवृत्ति

    Published: Wed, 15 Nov 2017 08:53 AM (IST) | Updated: Wed, 15 Nov 2017 10:07 AM (IST)
    By: Editorial Team
    baba nagarjuna img 15 11 2017

    हिंदी साहित्य के महान कवि-लेखकों में गिने जाने वाले बाबा नागार्जुन का जीवन इतने उतार-चढ़ावों में बीता कि उनकी जिंदगी का हर दौर अनूठे किस्सों से भरा हुआ है। किशोर अवस्था से ही उनकी प्रतिभा ने कमाल दिखाना शुरू कर दिया था।

    महाविद्यालय के दौर का एक किस्सा है कि उन्होंने कविता के पांच ऐसे छंद लिखे कि उन्हें कॉलेज द्वारा दी जाने वाली महत्वपूर्ण छात्रवृत्ति मिलने लगी। इस तरह अपनी कविता के महज कुछ छंदों के कारण उनकी पूरी पढ़ाई लगभग मुफ्त हो गई थी। किस्सा सन्‌ 1934 के आसपास का है। बाबा नागार्जुन तब युवा थे और काशी में अध्ययन कर रहे थे।

    उसी दौर में एक दिन उनके मामा घर आए और कहने लगे - 'तुम हमारे साथ कलकत्ते चलो तो वहां पढ़ाई भी होगी और कुछ कमाई भी।' पढ़ाई करने की धुन में नागार्जुन मामाजी के साथ कलकत्ता आ गए। वहां जिस नामी संस्कृत कॉलेज में दाखिला लिया, कभी महान विचारक ईश्वरचंद विद्यासागर उसके प्राचार्य रह चुके थे।

    नागार्जुन के लिए वहां पढ़ना प्रतिष्ठा की बात थी। कॉलेज में उन्हें पता चला कि प्रतिभावान विद्यार्थी को छात्रवृत्ति मिल सकती है,लेकिन इसका निर्णय प्रिंसिपल लेते हैं।

    यह सुनकर बाबा नागार्जुन ने तुरंत पांच छंद लिखे और उनमें प्रिंसिपल का नाम भी ऐसे शामिल कर दिया कि उस नाम का एक अर्थ प्रिंसिपल की प्रशंसा में जबकि दूसरा अर्थ छंद की महत्ता के रूप में निकल रहा था। इस प्रतिभा से प्रिंसिपल बहुत प्रभावित हुए और नागार्जुन के लिए तुरंत छात्रवृत्ति स्वीकृत कर दी। और वो भी पूरे 15 रुपए, जिसमें से 5 रुपए में वे खुद का गुजारा चलाते, 5 रुपए अपने गांव पिताजी को भेजते और 5 रुपए पुस्तकें खरीदने में खर्च करते। पिता को भेजे 5 रुपए पर पूरा गांव गर्व करता था कि 'छोरा कलकत्ते जाकर कमाने लग गया है!'

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