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    जुर्माना भरने के लिए गुरमीत के पास पैसे नहीं- वकील

    Published: Mon, 09 Oct 2017 09:07 PM (IST) | Updated: Tue, 10 Oct 2017 09:55 AM (IST)
    By: Editorial Team
    ram rahim court video 09 10 2017

    चंडीगढ़। हजारों करोड़ के मालिक डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत के पास जुर्माना भरने के लिए 30 लाख रुपए नहीं हैं। पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट में गुरमीत के वकील एसके गर्ग ने यह दलील दी है। हालांकि कोर्ट ने इसे मानने से इन्कार कर दिया और दो महीने के भीतर रकम ट्रायल कोर्ट में जमा कराने के आदेश दिए।

    इसके साथ ही हाई कोर्ट ने सजा के खिलाफ गुरमीत की अपील सुनवाई के लिए मंजूर कर ली है। दूसरी तरफ गुरमीत की सजा बढ़ाने की मांग करने वाली याचिका पर गुरमीत और सीबीआई को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।

    सोमवार को जस्टिस सूर्य कांत और जस्टिस सुधीर मित्तल की खंडपीठ से गुरमीत के वकील एसके गर्ग नरवाना ने आग्रह किया कि सीबीआई की विशेष अदालत ने गुरमीत के खिलाफ 30 लाख 20 हजार रुपए का जुर्माना लगाया है। इसे अदा करने में वह असमर्थ हैं।

    गर्ग ने कहा कि गुरमीत अब संसार का एक तरह से त्याग कर चुके हैं। इस पर खंडपीठ ने कहा कि गुरमीत के पास काफी संपत्ति और बैंक खाते हैं। वह रकम अदा करें। यह रकम किसी बैंक में फिक्स्ड डिपॉजिट के तौर पर जमा रहेगी। पीठ ने यह राशि साध्वियों को जारी किए जाने पर रोक लगा दी।

    हाई कोर्ट ने कहा कि गुरमीत की अपील यदि स्वीकार कर ली गई तो यह राशि ब्याज समेत उसे लौटा दी जाएगी। अपील खारिज हो गई तो पीड़ित साध्वियों को दे दी जाएगी। इसका सीबीआई ने विरोध किया। कहा कि यह राशि जुर्माने की नहीं बल्कि एक तरह से पीड़ित साध्वियों को मुआवजे की राशि है। इस पर रोक नहीं लगाई जानी चाहिए। साध्वियों के वकील ने भी इसका विरोध किया, पर पीठ उनके तर्कों से सहमत नहीं हुई।

    गुरमीत के वकील ने कहा, दो सप्ताह का समय दिया जाए -

    गुरमीत के वकील गर्ग ने हाई कोर्ट को कहा कि उनका मुवक्किल निर्दोष हैं, उन्हें अपनी अपील पर बहस के लिए दो सप्ताह का समय दिया जाए। इस पर पीठ ने कहा कि दोनों ही पक्षों की अपील एडमिट कर ली गई हैं। दोनों ही अपीलों पर सुनवाई के समय बहस शुरू की जा सकती है।

    गुरमीत की अपील का आधार -

    - सीबीआई के विशेष कोर्ट ने बिना उचित साक्ष्यों और गवाहों के दोषी करार दिया है

    - एफआईआर ही दो-तीन साल की देर से दायर की गई।

    - एक गुमनाम पत्र के आधार पर दर्ज की गई एफआइआर में शिकायतकर्ता का नाम तक नहीं था।

    - पीड़िताओं के बयान भी सीबीआई ने छह वर्ष बाद रिकॉर्ड किए।

    - दोनों पीड़िताएं सीबीआई के संरक्षण में थी। उन पर अभियोजन का दबाव था।

    - अदालत ने बचाव पक्ष के साक्ष्यों और गवाहों पर गौर ही नहीं किया।

    - सीबीआई ने गुरमीत के मेडिकल परीक्षण की जरूरत नहीं समझी।

    साध्वियों की याचिका का आधार -

    - गुरमीत उसके (एक साध्वी के) भाई की हत्या का भी अभियुक्त है।

    - अभियोजन ने सख्त सजा दिए जाने की मांग की थी, लेकिन दस-दस वर्ष की सजा सुनाई गई, उसे उम्रकैद की सजा देनी चाहिए।

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