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    रेडियो पर जगाया हिंदी कहानियों का जादू

    Published: Wed, 13 Sep 2017 09:47 AM (IST) | Updated: Thu, 14 Sep 2017 11:05 AM (IST)
    By: Editorial Team
    nilesh mishra hindi 13 09 2017

    कपिल पंचोली। यह उस दिन की बात है जब बतौर पत्रकार नीलेश मिश्रा ने हिंदुस्तान टाइम्स के 'ब्रंच" में एक लेख लिखा था। लेख था दूरदर्शन के 50 बरस पूरे होने के मौके पर। जब यह लेख प्रकाशित हुआ तो बहुत सारे ईमेल और खत आए। लेख को पढ़कर रानीखेत की एक महिला ने कहा कि लगता है आप अच्छे आदमी हैं, कभी रानीखेत आना हो तो घर आइएगा, चाय पीकर जाइएगा।

    आखिर यह क्या लेख था? इस लेख में नीलेश ने नॉस्टेल्जिया जगाने का काम किया था। उन्होंने बताया कि कैसे वह दूरदर्शन के साथ बड़े हुए। उनके घर में लकड़ी का पुराना डिब्बानुमा टीवी था। यह भी कि जब उस पर भारत और वेस्टइंडीज के मैच का प्रसारण हो रहा होता था, कैसे उनके नानाजी की पूजा में व्यवधान होता था और वह आकर टीवी बंद कर देते थे।

    फिर जब टीवी ऑन होता था, तब तक तो तीन विकेट भी गिर चुके होते थे और मॉल्कम मार्शल का तूफान टीम इंडिया को बिखेर सकता था। फिर इस लेख में उन्होंने बताया कि किस तरह वे लखनऊ की गलियों में खेलते हुए बड़े हुए और दादी उन्हें अमरूद वगैरह देती थीं। इसने कई लोगों को उनका बचपन याद दिला दिया।

    इस लेख से पहले और इसके बाद भी नीलेश का मानना था कि हमारे यहां नॉस्टेल्जिया को कम ही पचाया जाता है। लेख की सफलता के बाद उन्होंने एक बैंड बनाया जिसमें नॉस्टेल्जिया से जुड़े गाने थे और बीच में वह कहानी सुनाते थे। यह कहानी सुनाने की शुरुआत थी। जब इसका अल्बम बन गया तो उन्होंने इसके प्रमोशन के लिए रेडियो से संपर्क किया। तब बिग एफएम के तरुण कत्याल ने उनकी आवाज सुनकर कहा कि वह रेडियो पर कहानी सुनाने वाला शो क्यों नहीं करते। उसके बाद रेडियो पर जो सिलसिला शुरू हुआ, वह मिसाल बन गया।

    शुरुआत में नीलेश को अंदाजा नहीं था कि एडवरटाइजिंग के जमाने में कहानी कैसे लिखते हैं। उन्हें यह अंदाज था कि कहानी को छह हिस्सों में लिखना चाहिए। शुरुआत में एक या सवा मिनट का एक हिस्सा होता था। हिंदी में नॉस्टेल्जिया जगाना काम कर गया। श्रोताओं की मांग पर कहानी का हर हिस्सा बढ़कर 3-4 मिनट का हो गया।

    जब उन्होंने रेडियो पर शुरू किया था तो उन्हें कहा गया था कि आज के युग में कहानियां कौन सुनना चाहता है। नीलेश कहते हैं कि मेरे मन में यही था कि मेरे पास खोने को कुछ है नहीं। मेरी एक आदत यह भी रही कि मैं बोझा लेकर नहीं चलता हूं। मैं नए तरह का काम पसंद करता हूं।

    तो रेडियो शुरू किया तो सोशल मीडिया पर लोग कहने लगे कि वे ऑफिस से देर से निकलने लगे हैं ताकि 9 बजे वाला शो सुन सकें। कई लोग घर पहुंच जाते थे लेकिन पार्किंग में खड़े रहते थे ताकि पूरी कहानी सुन सकें। हॉस्टल स्टूडेंट्स ने कहा कि उनके मेस में खाने का समय बदल गया है। यह मेरे लिए अद्भुत बात थी।

    नीलेश ने बताया कि जब बड़ी संख्या में लोग हिंदी बोलते हैं तो फिर हिंदी की कहानियां भी सुनी जाएंगी ही। 'फिर शो चला तो कुछ लोग आने लगे कि हम लिखते हैं। पहले मेरी थोड़ी झिझक थी कि मैं कहानियां खरीदकर नहीं सुनाना चाहता था। लेकिन 3-4 लोग हो गए और हम मंडे को मिलते थे तो हमने समूह का नाम मंडली रखा। हम मिलने लगे।

    एक-एक करके सब कहानी सुनाते थे और हमें उस कहानी पर विश्लेषण करना होता। शुरुआत में मैं सबसे ज्यादा बोलता था। बताता था कि कहानी में क्या कमी है और क्या होना चाहिए। मगर धीरे-धीरे तो मेरे बोलने के लिए कुछ बचा नहीं। दूसरे लोग सारी बातें पहले ही कह देते थे कि कहानी में क्या कमी है। कहानी के हमने कुछ नियम बनाए कि किसी को स्टीरियोटाइप नहीं करेंगे। जिन शारीरिक विशेषताओं के आधार पर अंतर पैदा करते हैं, वह हम नहीं करेंगे। इस तरह यह सफर हिंदी सुनने वालों की दुआ से यहां तक पहुंच गया।

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