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    ट्रेन की खिड़की गिरने से अंगुलियां खराब हुई तो रेलवे देगा हर्जाना

    Published: Sun, 06 Sep 2015 11:01 PM (IST) | Updated: Mon, 07 Sep 2015 09:00 AM (IST)
    By: Editorial Team
    trains 06 09 2015

    माला दीक्षित, नई दिल्ली। रेलवे के लिए न सिर्फ यात्रियों को समय पर पहुंचाने की जिम्मेदारी है, बल्कि ट्रेनों को भी चाक चौबंद दुरुस्त रखने की जिम्मेदारी है। व्यवस्था में खामी के कारण किसी को चोट पहुंचती है तो रेलवे को हर्जाना देना होगा।

    ऐसे ही एक मामले में राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने सफर के दौरान ट्रेन की खिड़की गिरने से हाथ की अंगुलियां खराब होने पर रेलवे को 50000 रुपये हर्जाना अदा करने का आदेश दिया है। अक्सर लोग रेल यात्रा के दौरान हुई असुविधा या ट्रेन के टूटे खिड़की, दरवाजों से लगी चोट को चुपचाप सह जाते हैं।

    रेलवे पर दावा नहीं करते। लेकिन सहारनपुर के होम्योपैथी डाक्टर जेके जैन ने हिम्मत नहीं हारी। तेरह साल मुकदमा लड़ा। उपभोक्ता अदालत ने रेलवे को सेवा में कमी का जिम्मेदार ठहराते हुए 80000 रुपये हर्जाना देने का आदेश दिया था। उत्तर प्रदेश राज्य उपभोक्ता आयोग ने फैसला पलट दिया। जिसके खिलाफ डाक्टर जैन ने राष्ट्रीय आयोग में अपील की थी।

    राष्ट्रीय आयोग के अध्यक्ष जस्टिस डीके जैन ने रेलवे को उपभोक्ता कानून के तहत सेवा में कमी का जिम्मेदार ठहराते हुए राज्य आयोग का फैसला निरस्त कर दिया। राष्ट्रीय आयोग कहा कि याचिकाकर्ता के वकील निखिल जैन ने पर्याप्त सबूत पेश किए हैं।

    रेलवे अस्पताल से जारी चिकित्सा प्रमाणपत्र व इलाज करने वाले सर्जन का प्रमाणपत्र है जिसमें चोटिल दोनों अंगुलियों के इलाज का ब्योरा दिया गया है। यह कहना गलत है कि रेलवे पर लगाए आरोप को याचिकाकर्ता साबित नहीं कर पाया। रेलवे ने शिकायत मिलने की बात भी स्वीकारी है।

    हालांकि ये बात रिकार्ड पर नहीं है कि दोषियों के खिलाफ क्या कार्रवाई की गई। राष्ट्रीय आयोग ने कहा कि वैसे तो याचिकाकर्ता की शिकायत पर रेलवे द्वारा कोई कार्रवाई न करना अपने आप में सेवा में कमी है। किसी भी पब्लिक अथारिटी में रखा गया कंप्लेन रजिस्टर महज औपचारिकता नहीं है। बल्कि रजिस्टर में जो शिकायतें दर्ज हों उन पर कार्रवाई होनी चाहिए और शिकायतें दूर की जानी चाहिए। राज्य आयोग ने ट्रेनों के डिब्बों का ठीक रखरखाव न करने के बारे में रेलवे को क्लीन चिट देकर भूल की है।

    क्या है मामला

    याचिकाकर्ता जेके जैन अपने भाई के साथ 27 नवंबर 2002 को सहारनपुर से मुजफ्फरनगर जिले के बारुत जाने के लिए ट्रेन पर सवार हुए। सुबह 5.30 का वक्त था। रोशनी और हवा के लिए उन्होंने खिड़की खोलनी चाही। जब वे लोहे के शटर को खोलने की कोशिश कर रहे थे कि तभी पीछे से शीशे के ग्लास का शटर उनके दाहिने हाथ पर गिर गया। जिससे उन्हें बीच की दो अंगुलियों में गंभीर चोट लगी।

    ट्रेन और स्टेशन पर चिकित्सा सुविधा उपलब्ध न होने पर उनके भाई नजदीकी डाक्टर के पास ले गए। जहां एक्सरे में उंगलियों में फ्रैक्चर का पता चला। जरूरी उपचार के बाद उनके भाई ने स्टेशन वापस आकर कंप्लेन रजिस्टर में शिकायत दर्ज कराई। चार हफ्ते तक लगातार इलाज के बावजूद अंगुलियां ठीक नहीं हुई और दोनों अंगुलियां हमेशा के लिए सुन्न हो गईं। शिकायत पर कोई जवाब नहीं मिलने पर उन्होंने जिला उपभोक्ता अदालत में शिकायत दाखिल कर मुआवजा मांगा था।

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