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    दिल्ली के कुछ इलाके मुसलमानों के लिए आरक्षित करना चाहते थे नेहरू

    Published: Fri, 17 Feb 2017 12:43 PM (IST) | Updated: Fri, 17 Feb 2017 12:49 PM (IST)
    By: Editorial Team
    nehru gandhi 17 02 2017

    नई दिल्ली। भारत-पाकिस्तान का बंटवारा दुनिया की उन चुनिंदा घटनाओं में से एक है, जिनमें लाखों निर्दोषों का कत्लेआम कर दिया गया। बंटवारे के दौरान खूब दंगे हुए और देश लहूलुहान हुआ। इतिहास बताता है कि उस दौर के राजनेताओं ने भी वैसी भूमिका नहीं निभाई, जैसी कि उस वक्त की दरकार थी।

    तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का कुछ और सोचना था, जबकि तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद और गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल का कुछ और। ऐसा ही एक वाकया है, जिसमें इन दिग्गज राजनेताओं का असमंजस और टकराव दिखाई देता है।

    किस्सा कुछ यूं है कि अगस्त में बंटवारे के कुछ दिन बाद भारत और पाकिस्तान में दंगों का दौर चल रहा था। पश्चिमी पंजाब (पाकिस्तान) से हिंदू अपना घर, जमीन, संपत्ति सब छोड़कर भाग रहे थे, क्योंकि वहां उनका कत्लेआम किया जा रहा था। इसी तरह दिल्ली से मुसलमानों को भागना पड़ रहा था।

    इसी बीच नेहरू ने प्रस्ताव रखा कि दिल्ली के कुछ इलाकों को मुसलमानों के लिए आरक्षित कर दिया जाए और वहां उनकी बस्तियां बसा दी जाएं। मगर डॉ. राजेंद्र प्रसाद और सरदार पटेल ने तुरंत इसका विरोध किया। उन्होंने चेताया कि 'ऐसा करना बहुत खतरनाक होगा क्योंकि ये अस्थायी बस्तियां कुछ साल बाद फिर नासूर बन जाएंगी।"

    इस पर नेहरू अड़ गए और महात्मा गांधी के पास गए। बापू ने भी कहा कि आरक्षित बस्ती बनना चाहिए, लेकिन वे प्रशासनिक हस्तक्षेप नहीं कर सकते थे। अंतत: पटेल और प्रसाद ने कड़ा विरोध जताया, तब जाकर नेहरू माने।

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