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    राष्ट्रपति पद पर आम सहमति चाहता है विपक्ष

    Published: Fri, 21 Apr 2017 10:09 PM (IST) | Updated: Sat, 22 Apr 2017 04:27 AM (IST)
    By: Editorial Team
    presidential election india 21 04 2017

    संजय मिश्र, नई दिल्ली

    राष्ट्रपति चुनाव में गैर एनडीए दलों की गोलबंदी की कोशिशों के बीच विपक्ष ने देश के शीर्ष संवैधानिक पद के लिए आम सहमति का रास्ता अभी बंद नहीं किया है। विपक्ष की नजर में सरकार पहल करे तो राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति दोनों पदों के लिए आम सहमति बनाई जा सकती है।

    मगर सहमति की यह गुंजाइश तभी बनेगी जब सत्ता पक्ष राष्ट्रपति पद के लिए ऐसे उम्मीदवार को लेकर सामने आए जिसकी व्यापक राजनीतिक स्वीकार्यता हो। साथ ही सरकार उपराष्ट्रपति पद के लिए विपक्ष की पसंद के उम्मीदवार पर हामी भरने का सकारात्मक संकेत दे।

    विपक्ष की अगुवाई कर रही कांग्रेस के रणनीतिकारों के अनुसार दो शीर्ष संवैधानिक पदों पर व्यापक राजनीतिक सहमति की बात कोई नई नहीं है। संयुक्त मोर्चा सरकार के समय 1997 में बाहर से समर्थन दे रही कांग्रेस ने जहां अपने उम्मीदवार केआर नारायणन को राष्ट्रपति बनवाया।

    वहीं यूनाइटेड फ्रंट की पसंद कृष्णकांत को उपराष्ट्रपति के रूप में स्वीकार किया। इसी तरह अटल बिहारी वाजपेयी की एनडीए सरकार ने 2002 में बेशक उपराष्ट्रपति पद पर अपने दिग्गज भैरोसिंह शेखावत को बैठाया मगर राष्ट्रपति पद के लिए सहमति बनाने के मद्देनजर गैर राजनीतिक शख्सियत मशहूर वैज्ञानिक भारत रत्न एपीजे अब्दुल कलाम को उम्मीदवार बनाया।

    तब वाजपेयी सरकार भी केवल एनडीए की संख्या बल के आधार पर अपने उम्मीदवार को राष्ट्रपति भवन नहीं पहुंचा सकती थी। मगर कलाम के मास्टर स्ट्रोक की वजह से कांग्रेस समेत विपक्ष की लगभग सभी पार्टियों को उनकी उम्मीदवारी का समर्थन करना पड़ा। जबकि 2007 में कांग्रेस ने यूपीए के साथ वामपंथी दलों के सहारे प्रतिभा पाटिल को जहां राष्ट्रपति बनाया वहीं वामदलों की पसंद हामिद अंसारी को उपराष्ट्रपति।

    मगर अभी सरकार से व्यापक राजनीतिक सहमति की उम्मीद कर रहे विपक्ष ने 2007 ही नहीं 2012 के राष्ट्रपति व उपराष्ट्रपति चुनाव में तत्कालीन विपक्षी खेमा एनडीए के साथ कोई सहमति नहीं बना सका था। राष्ट्रपति चुनाव को लेकर शुरू हुई इन सरगर्मियों के बारे में पूछे जाने पर जदयू महासचिव केसी त्यागी ने कहा, "आगे देखिए अभी तो चर्चाओं का आगाज ही हुआ है।"

    राष्ट्रपति व उपराष्ट्रपति पद के लिए पिछले दो ताजा चुनाव के अनुभवों को देखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाला एनडीए सहमति की गुंजाइश के लिए राजी होगा इसमें संदेह है। खासकर यह देखते हुए कि एनडीए को अपना राष्ट्रपति जिताने के लिए 25000 वोटों की ही कमी है।

    इस संख्या को एनडीए अन्नाद्रमुक और बीजद जैसे उन दलों के सहारे हासिल कर सकता है जो फिलहाल न एनडीए के साथ हैं और न विपक्षी गोलबंदी का हिस्सा। विपक्षी खेमे को उम्मीद है कि भाजपा ने उड़ीसा में अपनी राजनीतिक ताकत बढ़ाने के फैसले के साथ जो सियासी आक्रामकता दिखायी है, उसे देखते हुए बीजद प्रमुख मुख्यमंत्री नवीन पटनायक अब एनडीए के साथ जाने से परहेज करेंगे।

    इसी तरह विपक्षी दलों की निगाहें एनडीए के एक प्रमुख घटक शिवसेना के रुख पर भी लगी हैं, जो पिछले दो राष्ट्रपति चुनाव में एनडीए के रुख से अलग गया था। 2007 में शिवसेना ने कांग्रेस उम्मीदवार प्रतिभा पाटिल का समर्थन किया था क्योंकि वे महाराष्ट्र से थीं। तो 2012 के चुनाव में भी एनडीए उम्मीदवार पीए संगमा को वोट देने के बजाय शिवसेना ने प्रणब मुखर्जी का समर्थन किया था।

    उस वक्त राजग का हिस्सा रहे जदयू ने भी प्रणब को वोट दिया था। जबकि एनडीए को अपना उपराष्ट्रपति बनाने में बहुत दिक्कत नहीं होने वाली क्योंकि इसमें केवल राज्यसभा और लोकसभा के सांसद ही वोट करते हैं। दोनों सदनों की संयुक्त संख्या के हिसाब से एनडीए को वोटों का बहुमत है।

    उपराष्ट्रपति चुनाव में केवल दोनों सदनों के सांसद ही वोट करते हैं। इस गणित को देखते हुए विपक्ष की व्यापक सहमति से राष्ट्रपति चुनाव कराने की उम्मीद दूर की कौड़ी जैसी दिख रही है।

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