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    रिश्तों की बुनियाद को ऐसे बनाएं मजबूत, नहीं टूटेंगे रिश्ते

    Published: Sat, 26 Jul 2014 03:33 PM (IST) | Updated: Wed, 12 Apr 2017 11:48 AM (IST)
    By: Editorial Team
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    - सद्गुरु जग्गी वासुदेव

    रिश्ते की प्रकृति चाहे जो हो, उसका बुनियादी पहलू यही है कि आप कुछ जरूरतें पूरी करना चाहते हैं। हमने कोई रिश्ता क्यों बनाया, इसके लिए हम तमाम दावे कर सकते हैं, अगर हमारी जरूरतें और उम्मीदें पूरी नहीं हुईं, तो रिश्ता बिगड़ जाएगा।

    जब जरूरतें बदल जाती हैं, तो दोनों लोगों के बीच जो चीज पहले बहुत मायने रखती थी, उसी चीज का थोड़े समय बाद वैसा महत्व नहीं रह जाता। लेकिन हमें रिश्ते को हमेशा उन्हीं पुरानी जरूरतों पर टिकाकर नहीं रखना चाहिए और यह नहीं सोचना चाहिए कि अब रिश्ते खत्म हो गए।

    मान लीजिए, आपने अपने बगीचे में एक नारियल और एक आम का पेड़ लगाया। जिस वक्त आपने ये दोनों पौधे लगाए, उनकी ऊंचाई बराबर थी। आपको लगा कि वे दोनों साथ-साथ बड़े होंगे, पूरे प्रेम के साथ। अगर इन दोनों पौधों को काट-छांट कर बौना बनाकर रखा जाए और उन्हें बड़ा न होने दिया जाए, तो वे एक-दूसरे के बराबर बने रहेंगे, लेकिन अगर उन दोनों को अपने तरीकों से बढ़ने दिया जाए, तो उनकी ऊंचार्ई, आकार और संभावनाएं सब कुछ अलग-अलग होंगी।

    अगर आप दो लोगों के बीच बराबरी की मांग कर हैं, तो रिश्ता टूटेगा ही। आखिरकार एक आदमी और औरत एक-दूसरे के करीब आते ही इसलिए हैं, क्योंकि वे अलग हैं। तो यह उन दोनों के बीच का अंतर ही है, जो उन्हें करीब लाता है। जैसे-जैसे इंसान विकास करने लगता है, यह अंतर बढ़ता जाता है और साफ तौर पर उभरकर सामने आता है। जब तक आप बड़े होने के साथ आने वाले अंतर को स्वीकार करना, पसंद करना नहीं सीखेंगे, आपके रिश्ते के बीच एक दूरी पैदा होती जाएगी।

    अगर आप यह उम्मीद कर रहे हैं कि दोनों लोग एक ही दिशा में एक ही तरह से बढ़ें, तो आप उन दोनों के साथ ही ज्यादती कर रहे हैं। इससे उन दोनों को ही जीवन में बंदिश और घुटन महसूस होगी। आप कुछ सालों में अलग हो जाते हैं, या कुछ महीनों में अलग हो जाते हैं या कुछ दिनों में अलग हो जाते हैं, यह इस पर निर्भर करता है कि आप कितनी तेजी से आगे बढ़ रहे हैं।

    ऐसी उम्मीद करना कि आपका जीवन-साथी बिल्कुल आपके जैसा ही हो, संबंध नष्ट करने का शर्तिया तरीका है। यह बगीचे को भी नष्ट कर देगा। अपने और अपने साथी के बीच मौजूद अंतरों को स्वीकार कीजिए, उन्हें विकसित होने दीजिए, उनका आनंद लीजिए। वरना ऐसी हालत हो जाएगी, जिसमें एक इंसान दूसरे पर निर्भर होने को मजबूर हो जाएगा, या यह भी हो सकता है कि दोनों ही एक-दूसरे पर बुरी तरह से निर्भर हो जाएं।

    हमें समझना चाहिए कि रिश्ते इसलिए बनते हैं, क्योंकि हमारी कुछ जरूरतें होती हैं, जैसे कि शारीरिक, भावनात्मक और मनोवैज्ञानिक जरूरतें। रिश्ते की प्रकृति चाहे जो हो, उसका बुनियादी पहलू यही है कि आप कुछ जरूरतें पूरी करना चाहते हैं। हमने कोई रिश्ता क्यों बनाया, इसके लिए हम तमाम दावे कर सकते हैं, लेकिन अगर हमारी जरूरतें और उम्मीदें पूरी नहीं हुईं, तो रिश्ता बिगड़ जाएगा।

    जैसे-जैसे लोग बड़े और परिपक्व होते हैं, ये जरूरतें भी बदलने लगती हैं। जब जरूरतें बदल जाती हैं, तो दोनों लोगों के बीच जो चीज पहले बहुत मायने रखती थी, उसी चीज का थोड़े समय बाद वैसा महत्व नहीं रह जाता। लेकिन हमें रिश्ते को हमेशा उन्हीं पुरानी जरूरतों पर टिकाकर नहीं रखना चाहिए और यह नहीं सोचना चाहिए कि अब रिश्ते खत्म हो गए। हम किन्हीं और चीजों के आधार पर रिश्ते को मजबूत बना सकते हैं।

    दो लोगों को एक साथ लाने वाली जरूरतें चाहे जो रही हों, उन जरूरतों को हमेशा के लिए उस रिश्ते की बुनियाद बनाने की जरूरत नहीं है। समय बदलने और उम्र बढ़ने के साथ जैसे-जैसे परिपक्वता आती है, रिश्ते का आधार भी बदलने की जरूरत है। अगर यह बदलाव नहीं लाया गया तो फिर दूरी बढ़ना या रिश्ता टूटना निश्चित है।

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