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    यहां हैं खुशियां फिर इधर-उधर क्यों खोजें

    Published: Tue, 21 Mar 2017 10:36 AM (IST) | Updated: Wed, 22 Mar 2017 09:19 AM (IST)
    By: Editorial Team
    happiness 21 03 2017

    - सद्गुरु जग्गी वासुदेव, आध्यात्मिक गुरु

    हम वस्तुओं में खुशी तलाश रहे हैं। ऐसा इसलिए है कि आप सुख को ही खुशी समझ बैठे हैं,जबकि खुशी आपको अपने भीतर खोजनी है।

    मिस्र की दंतकथा है। अगर कोई व्यक्तिस्वर्ग में प्रवेश पाना चाहता है तो स्वर्ग के प्रवेश द्वार पर उसे दो सवालों के जवाब देने होते हैं। अगर आपने इन दोनों सवालों केजवाब 'हां' में नहीं दिए तो स्वर्ग में प्रवेश नहीं मिलता। इसमें पहला सवाल है- 'क्या जीवनमें आपने खुशी और आनंद का अनुभव कियाहै?'

    और दूसरा सवाल है- 'क्या आपने अपनेआस पास के लोगों को खुशी बांटी है?' इनदोनों ही सवालों के लिए आपका जवाब अगर'हां" है तो मैं आपको यह बता दूं कि आप तोपहले से ही स्वर्ग में हैं।

    आप खुद के लिए और अपने आसपास के लोगों के लिए सबसे अच्छी चीज जो कर सकते हैं, वह है खुद को एक आनंदमय इंसान बनाना। खासकर आज के दौर में जब क्रोध, नफरत और असहनशीलता भयानक तौर से लोगों के सिर चढ़कर बोल रही है, ऐसे में आनंदमय इंसान ही सबसे बड़ी राहत नजर आता है। जो लोग आनंदमय होने का महत्व जानते हैं, वही हर तरफ आनंद का माहौल बनाने की कोशिश करेंगे। सवाल यह है कि आनन्द में कैसे रहें?

    पांच साल की उम्र में आप बगीचे में तितली के पीछे भागते थे, आपको याद होगा। तितली को छूते हुए उसके रंग आपके हाथ पर झिलमिलाते हुए चिपक जाते थे। उस समय आपको यही अनुभव होता था कि दुनिया में इससे बढ़कर और कोई आनंद है ही नहीं। आपके अंदर खुशी उमड़कर फूट रही थी, है न?

    पांच साल में आपका कद कितना था? अब आपकी लंबाई कितनी है? आपकी खुशी भी उसी अनुपात में बढ़नी चाहिए थी न? बड़े होकर आप अपना अतीत ढोने लगे। जबआप अपने अतीत का बोझ लेकर चलते हैं, तो आपका चेहरा लटक जाता है, खुशी गायब हो जाती है, उत्साह खत्म हो जाता है।

    - खुशी, शांति और प्रेम- ये कोई आध्यात्मिक लक्ष्य नहीं हैं। ये सब तो समझदारी पूर्वक जीने की शुरुआत हैं। इन्हें समझिए।

    - आप जो भी काम खुशी-खुशी करते हैं, वो हमेशा सहजता से हो जाता है।

    - अगर आप खुशी चाहते हैं तो आपको भीतर की ओर मुड़ना होगा।

    - अपने प्रेम, अपनी खुशी और अपने उल्लासको रोककर मत रखें। आप जो देते हैं, वहीआपका गुण बन जाता है, न कि वह जो आप रोक कर रखते हैं।

    साल के, इसका सीधा-सा मतलब हुआ किआप उतने सालों का कूड़ा ढो रहे होते हैं। जब आप बड़े हुए तो खुशी से रहने केलिए कई चीजों को ढूंढकर इकट्ठा किया। ऊंची पढ़ाई, कंम्प्यूटर, अपना मकान, मोटर बाइक,गाड़ी, क्रेडिट कार्ड, टेलीविजन, डीवीडी, एसी, मोबाइल फोन वगैरह-वगैरह। जाने कितनी सुबिधाएं जमा कर लीं? लेकिन क्या हुआ? खुशियां पाने के लिए जिंदगी में इतना सब कुछ पाने के बावजूद आपने सिर्फ खुशी को गंवा दिया।

    कहां गईं आपकी खुशियां? ऐसा इसलिए है कि आप सुख को ही खुशी समझ बैठे हैं, जबकि खुशी भीतर खोजनी है। लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि 'सच्चा आनंद क्या है?' सच्चे आनंद और मिथ्या आनंद जैसी कोई चीज नहीं होती।

    जब आप वास्तव में सत्य के संपर्क में होते हैं, तब आप स्वाभाविक रूप से आनंद में होते हैं।' इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप किस तरह आनंदित होते हैं। आप किसी भी तरह आनंद का अनुभव करते हैं।

    यही सबसे बड़ी बात है। आप आनंद में होना जीते हैं यही सबसे बड़ी बात है। सर्वोच्च प्राथमिकता है। अब सवाल है इसे कायम रखने का, इसे कायम रखने के योग्य कैसे बनें? हमारे जीवन में आने वाली खुशी बनी कैसे रहे?

    अधिकांश लोग सुख को ही आनंद समझ लेते हैं। आप कभी भी सुख को स्थायी नहीं बना सकते,ये आपके लिए हमेशा कम पड़ते हैं, किन्तु आनंद पूर्णता का अर्थ है कि यह किसी भी चीज पर निर्भर नहीं है।

    सुख हमेशा किसी वस्तु या व्यक्ति पर निर्भर करता है। आनन्द किसी परनिर्भर नहीं करता है, यह तो आपकी अपनी प्रकृति है। यह एक कुएं को खोदने जैसा है।

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