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    भारत का अभिन्न अंग है कश्मीर, जानें अनकहे तथ्य

    Published: Wed, 17 May 2017 10:04 AM (IST) | Updated: Wed, 17 May 2017 10:28 AM (IST)
    By: Editorial Team
    dallakeji 17 05 2017

    कल्हण संस्कृत भाषा के महान कवि थे। उन्होंने राजतरंगिणी में लिखा है कि, 'कश्मीर को आध्यात्मिक शक्ति से तो जीता जा सकता है, लेकिन सैन्य शक्ति से नहीं।'

    राजतरंगिणी 1184 ईसापूर्व के राजा गोनंद से लेकर राजा विजयसिम्हा (1129 ईसवी) तक के कश्मीर के प्राचीन राजवंशों और राजाओं का प्रमाणिक दस्तावेज़ तो है ही साथ ही वहां के सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन का भी काव्यात्मक आख्यान है।

    दरअसल, कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है। जिसके अलग-अलग भागों पर भारत तथा पाकिस्तान का अधिपत्य है। यहां का प्राचीन विस्तृत लिखित इतिहास है राजतरंगिणी, जो कल्हण द्वारा 12वीं शताब्दी ई. में लिखा गया था। तब तक यहां पूर्ण हिन्दू राज्य रहा था।

    यह अशोक महान के साम्राज्य का हिस्सा भी रहा। लगभग तीसरी शताब्दी में अशोक का शासन रहा था। तभी यहां बौद्ध धर्म का आगमन हुआ, जो आगे चलकर कुषाणों के अधीन समृध्द हुआ था।

    उज्जैन के महाराज विक्रमादित्य के अधीन छठी शताब्दी में एक बार फिर से हिन्दू धर्म की वापसी हुई। उनके बाद ललितादित्या हिन्दू शासक रहा, जिसका काल 697 ई. से 738 ई. तक था।

    अवन्तिवर्मन ललितादित्या का उत्तराधिकारी बना। उसने श्रीनगर के निकट अवंतिपुर बसाया। उसे ही अपनी राजधानी बनाया। जो एक समृद्ध क्षेत्र रहा। उसके खंडहर अवशेष आज भी शहर की कहानी कहते हैं। यहां महाभारत युग के गणपतयार और खीर भवानी मन्दिर आज भी मिलते हैं।

    गिलगिट में पाण्डुलिपियां हैं, जो प्राचीन पाली भाषा में हैं। उसमें बौद्ध लेख लिखे हैं। त्रिखा शास्त्र भी यहीं की देन है। यह कश्मीर में ही उत्पन्न हुआ। इसमें सहिष्णु दर्शन होते हैं।

    चौदहवीं शताब्दी में यहां मुस्लिम शासन आरंभ हुआ। उसी काल में फारस से सूफी इस्लाम का भी आगमन हुआ। यहां पर ऋषि परम्परा, त्रिखा शास्त्र और सूफी इस्लाम का संगम मिलता है, जो कश्मीरियत का सार है।

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