Naidunia
    Saturday, September 23, 2017
    PreviousNext

    जानिए देवगुरु क्यों करते थे अपने भाई संवर्त से ईर्ष्या

    Published: Thu, 13 Aug 2015 04:26 PM (IST) | Updated: Fri, 14 Aug 2015 06:00 AM (IST)
    By: Editorial Team
    devguru 13 08 2015

    कोई चाहे तो कितना ही बड़ा क्यों न हो, कितना ही विवेकशील ही क्यों न हो, ईर्ष्या उसका पतन अवश्य कर देती है। ईर्ष्या से लोग अपमानित होते हैं। ईर्ष्या करने के उदाहरण इंसानों में ही नहीं बल्कि देवताओं में भी मिलते हैं।

    एक समय की बात है बृहस्पति देव देवताओं के गुरु हैं। बृहस्पति के एक भाई थे, उनका नाम था संवर्त। वह बड़े ही विद्वान और सज्जन व्यक्ति थे। इस कारण से बृहस्पति को उनसे ईर्ष्या होने लगी। उन्होंने संवर्त को बहुत कष्ट दिए। यहां तक की उन्हें घर से निकाल दिया। वह पृथ्वी पर आकर गांव-गांव घूमने लगे।

    उन्हीं दिनों इक्ष्काकु वंश के मरुत नाम के राजा ने भगवान शिव को अपनी कठोर तपस्या से प्रसन्न करके वरदान स्वरूप हिमालय की किसी चोटी पर सोने की राशि प्राप्ति की और उससे महायज्ञ का आयोजन किया। मरुत ने देवगुरु बृहस्पति से यज्ञ करने की इच्छा व्यक्ति की लेकिन उन्होंने मना कर दिया।

    पढ़ें:जब माता पार्वती ने दिया अपने पुत्र कार्तिकेय को शाप

    बृहस्पति को यह ठीक नहीं लगा। उन्होंने विचार किया कि कहीं इतना बड़ा यज्ञ करके मरुत देवराज से अधिक यश प्राप्त न कर लें। उधर बृहस्पति से निराश हुए मरुत उनके भाई संवर्त से मिले। संवर्त से उन्होंने यज्ञ कराने की प्रार्थना की। संवर्त राजी हो गए।

    जब यह बात बृहस्पति को पता चली की यज्ञ संवर्त करा रहे हैं तो उन्हें और अधिक ईर्ष्या होने लगी। वह दिन रात इसी सोच में बीमार और कमजोर होते चले गए। आचार्य की यह दशा देख देवराज चिंतित हो गए।

    देवराज के बहुत आग्रह पर बृहस्पति ने कहा, 'मेरा भाई संवर्त मरुत राजा का यज्ञ करा रहा है। यह मुझसे नहीं देखा जाता। इसलिए मेरी यह दशा हो रही है।' इंद्र ने कहा, 'आप सर्वश्रेष्ठ हैं संवर्त आपको कुछ भी नहीं कर सकता।'

    बृहस्पति ने इंद्र से कहा कि किसी भी तरह मरुत के इस यज्ञ को रोक दो। इंद्र ने अग्नि देव से राजा मरुत का यज्ञ रोकने को कहा, 'अग्नि देव राजा मरुत के यहां पहुंचे। राजा मरुत अग्नि देव को आया देख उनके सम्मान में सत्कार के लिए पहुंचे।'

    सत्कार पूरा होने के बाद राजा मरुत से अग्नि देव ने कहा कि आप संवर्त जी को यज्ञ करने से रोक दें मैं आपके लिए बृहस्पति से विनय याचना करूंगा। संवर्त को जब यह मालूम हुआ तो वो काफी क्रोधित हो गए।

    उन्होंने कहा, 'आप ऐसा न करें मुझे अधिक क्रोध आ गया तो में आपको जलाकर भस्म कर दूंगा। ब्रह्मचर्य में वह शक्ति होती है कि आग भी जलकर भस्म हो जाती है।'

    संवर्त की चेतावनी सुनकर अग्नि देव चले गए। उन्होंने पूरा हाल देवराज को सुनाया। देवराज को हंसी आ गई उन्होंने कहा कि आप तो स्वयं अग्निदेव हैं आपको कौन भस्म कर सकता है। तब अग्निदेव ने देवराज से कहा कि आप ब्रह्मचर्य की शक्ति से परिचित नहीं हैं।

    पढ़ें:मंगलमय हनुमानजी करते हैं मंगल दोष को दूर

    इसके बाद इंद्र ने एक गंधर्व को राजा मरुत के पास भेजा। उससे कहलवाया कि अगर राजा मरुत संवर्त का साथ नहीं छोड़ेंगे तो इंद्र उनका शत्रु बन जाएगा। उस गंधर्व ने ऐसा ही राजा मरुत से कहा।

    राजा संवर्त ने जब सुना तो उन्होंने संवर्त की शरण ली। संवर्त ने राजा से कहा कि, 'आप डरिए नहीं।' तय समय पर देवराज इंद्र ने राजा मरुत के यहां युद्ध के लिए पहुंचे।

    संवर्त ने अपने ब्रह्मचर्य के बल पर राजा इंद्र को हरा दिया। उधर जब यह बात बृहस्पति को पता चली तो उन्हें भी अपनी गलती का बहुत पछतावा हुआ और उन्होंने स्वयं आकर संवर्त से अपने कर्मों के लिए क्षमा मांगी।

    प्रतिक्रिया दें
    English Hindi Characters remaining


    या निम्न जानकारी पूर्ण करें
    नाम*
    ईमेल*
    Word Verification:*
    Please answer this simple math question.
    +=

      जरूर पढ़ें