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    जब महाराज रघु के तीर से टूट गया रावण का अहंकार

    Published: Fri, 25 Jul 2014 12:28 PM (IST) | Updated: Tue, 05 Aug 2014 09:14 AM (IST)
    By: Editorial Team
    labjapatiravab 2014725 174922 25 07 2014

    रामायण की इस घटना के बारे में शायद बहुत कम लोगों को पता होगा कि, रावण को अयोध्या के महाराज अनरण्य ने श्राप दिया था कि, उनका वंशधर ही उसका वध करेगा। इस श्राप से रावण परेशान था।

    ब्रह्माजी का वरदान प्राप्त होने के कारण वह निश्चिंत था। इस श्राप के फलस्वरूप वह अयोध्या को राजाओं का शत्रुओं बन गया। जब महराज रघु अयोध्या का सिंहासन पर आसीन हुए तब रावण अयोध्या पहुंचा।

    संयोग ऐसा बना कि रावण जब अयोध्या पहुंचा, तो राजा रघु नगर का निरीक्षण करने गए हुए थे। राजमहल के द्वार पर पहुंचकर रावण ने द्वारपाल द्वारा संदेश भेजा, कि रघु से कहो कि राक्षसराज दशानन आया है और उनसे द्वन्द युद्ध करना चाहता है।

    दशानन का संदेश सुनकर महामंत्री द्वार पर पहुंचे। उन्होंने कहा कि राजा रघु, नगर में नहीं हैं आप किसी और समय यहां आएं। पता नहीं क्यों आपको मरने की इतनी जल्दी है, थोड़ी प्रतिक्षा कर लीजिए।

    रावण, मंत्री की बात सुनकर चिढ़ गया। उसने कहा कि पृथ्वी पर एक ही चक्रवर्ती सम्राट है और वो मैं हूं। इतना कहकर रावण चला गया।

    जब महाराज रघु लौटे तो महामंत्री से रावण आगमन और चुनौती भरी और प्रत्यंचा चढ़ा ली और लंका की तरफ तीर छोड़ दिया। उस तीर में से कई लाख तीर और बिखर गए। लंका के कई भवन और ध्वस्त होने लगे। लंका में त्राहि-त्राहि हो गई।

    रावण विद्वान था। उसने पहचान लिया कि किसी ने नारायणशास्त्र का प्रयोग किया है। उसने घोषणा कर दी कि कोई रथ पर न बैठे। कोई किसी प्रकार का अस्त्र-शस्त्र हाथ में न ले। सभी हाथ ऊपर उठाकर कहें कि हम महाराज रघु की शरण में हैं।

    लंका सूरवीरों ने रावण की इस आज्ञा का पालन किया। स्वंय रावण ने भी ऐसा ही किया। सभी तीर वापस लौट गए पर लंका का आठवां भाग पूरी तरह नष्ट हो चुका था। इस घटना के बाद रावण, जब तक महाराज रघु जीवित रहे, तब तक उसने अयोध्या की ओर कूच करने का साहस नहीं किया।

    महाराज रघु के बाद आयोध्या के राजा अज और दशरथ से वह पराजित होता रहा और अंत में भगवान श्रीराम ने रावण का वध किया।

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    • Vivek Baghel07 Aug 2014, 06:01:20 PM

      Really such a Wonderful Story =D

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