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    मानव बलि के बारे में क्या कहते हैं ग्रंथ, जानकर हो जाएंगे हैरान!

    Published: Fri, 19 May 2017 09:49 AM (IST) | Updated: Sat, 20 May 2017 09:59 AM (IST)
    By: Editorial Team
    manavbali 19 05 2017

    हाल ही में छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले में आने वाले भगवानपुर एवं गोरखा के बीच जनवरी 2016 में तंत्र तंत्र की साधना करते हुए एक पिता ने अपने ही पुत्र की हत्या कर दी थी, जिसमें विशेष न्यायालय ने पिता को आजीवन कारावास फैसला सुनाया।

    दरअसल यह पहला मामला नहीं है, ऐसे कई मामले सदियों से होते रहे हैं। लेकिन सवाल यह है जिस ईश्वर ने इंसान को बनाया, क्या वो उसी इंसान की बलि लेकर खुश होगा? यह पूरी तरह से धार्मिक पाखंड है। जो सदियों से जारी है।

    मानव बलि के बारे में जब हम इतिहास की किताबों के सुनहरे पन्ने पलटेंगे तो हैरतंगेज जानकारियां मिलेंगी। सदियों पहले यानी 7वीं सदी में बाणभट्ट ने चंडिका के एक मंदिर में मानव बलि की एक श्रेणी के विषय में बताया है।

    इसी प्रकार 9वीं सदी में हरिभद्र ने भी उड़ीसा के चंडिका मंदिर में बलिदान के विषय में बताया है। यह भारत के दक्षिणी भागों में 'अधिक सामान्य' था। उत्तरी कर्नाटक के कुकनूर कस्बे में एक प्राचीन काली मंदिर है जिसका निर्माण 8वीं-9वीं सदी के लगभग हुआ है, इस मंदिर में मानव बलि का इतिहास रहा है।

    जब हमने इस विषय के बारे में और किताबों के पन्नों को पलटा तो पता चला कि कर्पूरादिस्तोत्रम (काली की स्तुति) के छंद 19 में दी गई सूची में मानव को देवी द्वारा बलिदान के लिए स्वीकृत प्रजातियों में से एक माना गया है?

    हाला कि, 1922 में सर जॉन जॉर्ज वूडरौफ ने कौला व्‍याख्याकर्ता स्वामी विमलानंद द्वारा कर्पूरादिस्तोत्रम की एक व्याख्या की है। इस रिपोर्ट में उन्होंने लिखा है कि 19वें छंद में दी गयी सूची में दिए गए पशु सिर्फ छह शत्रुओं के प्रतीक हैं और इसमें से इंसान अहंकार का प्रतीक है।

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