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    पारसी नववर्षः शाह जमशेदजी ने की थी नवरोज की शुरुआत

    Published: Mon, 18 Aug 2014 05:01 PM (IST) | Updated: Wed, 22 Mar 2017 09:18 AM (IST)
    By: Editorial Team
    navarojjj 2017321 144547 18 08 2014

    कहते हैं कि शाह जमशेदजी ने पारसी धर्म में नवरोज मनाने की शुरुआत की थी। यह दिन पारसी धर्मावलंबियों के लिए विशेष महत्‍व रखता है।

    नवरोज के दिन पारसी परिवारों में बच्‍चे, बड़े सभी सुबह जल्‍दी तैयार होकर, नए साल के स्‍वागत की तैयारियों में लग जाते हैं।

    इस दिन पारसी लोग अपने घर की सीढियों पर रंगोली सजाते हैं। चंदन की लकडियों से घर को महकाया जाता है। यह सबकुछ सिर्फ नए साल के स्‍वागत में ही नहीं, बल्कि हवा को शुद्ध करने के उद्देश्‍य से भी किया जाता है।

    इस दिन पारसी घरों में सुबह के नाश्‍ते में ‘रावो’ नामक व्‍यंजन बनाया जाता है। इसे सूजी, दूध और शक्‍कर मिलाकर तैयार किया जाता है।

    नवरोज के दिन पारसी परिवारों में विभिन्‍न शाकहारी और मांसाहारी व्‍यंजनों के साथ मूंग की दाल और चावल बनते हैं।

    विभिन्‍न स्‍वादिष्‍ट पकवानों के बीच मूंग की दाल और चावल उस सादगी का प्रतीक है, जिसे पारसी समुदाय के लोग हमेशा भोजन में लेते हैं।

    नवरोज के दिन घर आने वाले मेहमानों पर गुलाब जल छिड़ककर उनका स्‍वागत किया जाता है। बाद में उन्‍हें नए वर्ष की लजीज शुरुआत के लिए ‘फालूदा’ खिलाया जाता है। ‘फालूदा’ सेंवइयों से तैयार किया गया एक मीठा व्‍यंजन होता है।

    जो बात इस पारसी नववर्ष को खास बनाती है, वह यह कि ‘नवरोज’ समानता की पैरवी करता है। इंसानियत के धरातल पर देखा जाए तो नवरोज की सारी परंपराएं महिलाएं और पुरुष मिलकर निभाते हैं।

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    त्‍योहार की तैयारियां करने से लेकर त्‍योहार की खुशियाँ मनाने में दोनों एक-दूसरे के पूरक बने रहते हैं।

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