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    उनको विश्वास था कि एक दिन लोग जरूर जिंदा होंगे

    Published: Thu, 18 May 2017 10:37 AM (IST) | Updated: Sat, 20 May 2017 10:08 AM (IST)
    By: Editorial Team
    mammymaking 18 05 2017

    मिस्र की सभ्यता काफी पुरानी है। इस सभ्यता में मृत शरीर को ममी बनाकर रखने की परंपरा थी। मृत्यु के बाद शवों का दाह संस्कार या दफन नहीं बल्कि उनमें विशेष रासायनिक लेप लगाकर उन्हें सुरक्षित रखा जाता था।

    मिस्र के राजाओं और उस समय मौजूद लोगों का विश्वास था कि एक न एक दिन यह शव जी उठेंगे। लेकिन...ऐसा नहीं हुआ।

    कैसे बनाते थे ममी

    ममी, प्राचीन मिस्र का शब्द है, वास्तविकता में यह अरबी भाषा के मुमिया से बना है। अरबी भाषा में मुमिया का अर्थ होता है मोम या तारकोल के लेप से सुरक्षित रखी गई चीज।

    ममी बनाने में लगभग 70 दिन का समय लगता था और इसे बनाने के लिए धर्मगुरु और पुरोहितों के साथ-साथ विशेषज्ञ भी होते थे। ममी बनाने के लिए सबसे पहले मृत शरीर की पूरी नमी को समाप्त किया जाता था, इस काम में कई दिन लगते थे।

    शरीर से नमी समाप्त होने के बाद उस पर कई प्रकार के लोशन, तेल और कई तरह के रोगन से मालिश की जाती थी। फिर पट्टियां लपेटने का काम किया जाता था और पूरे शरीर पर पतले कॉटन की परत-दर-परत पट्टियां लपेटी जाती थीं।

    पट्टी लपेटने के बाद शरीर के आकार से मिलते-जुलते लकड़ी के ताबूत तैयार किए जाते थे। इन ताबूतों को रंगकर मृत व्यक्ति या पशु के चेहरे सहित उसका रूप दिया जाता था। इसके बाद धर्मगुरु के मतानुसार इस पर धार्मिक वाक्य आदि लिखे जाते थे और एक धार्मिक समारोह करके ताबूत को शरीर समेत चबूतरे पर सम्मान के साथ रख दिया जाता था।

    आधुनिक समय में भी बनाई गईं थीं ममी

    आधुनिक युग में साम्यवादी देशों में लोग अपने महान नेताओं की ममी तैयार करवाते हैं। आधुनिक रूस के निर्माता और बोल्शेविक क्रांति के जनक लेनिन की ममी रूस में तैयार करवाई गयी थी और वह आज भी वहां म्यूजियम में रखी हुई है।

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