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    रुद्राक्ष धारण कीजिए होने लगेंगे 'चमत्कार'

    Published: Sat, 04 Mar 2017 04:24 PM (IST) | Updated: Mon, 06 Mar 2017 05:00 AM (IST)
    By: Editorial Team
    rudrakshaji 04 03 2017

    रुद्राक्ष दो शब्दों रुद्र यानी भगवान शंकर व अक्ष यानी आंसू से मिलकर बना है। शिवमहापुराण के अनुसार एक समय भगवान शंकर ने संसार के उपकार के लिए हजारों वर्ष तप किया। जब उन्होंने अपने नेत्र खोले तो उनके नेत्र से आंसू की बूंदें पृथ्वी पर गिर गई।

    इन बूंदों ने वृक्ष का रूप धारण किया। इस वृक्ष से जो फल प्राप्त हुआ उसकी गुठली ही रुद्राक्ष के रूप में मनुष्य को प्राप्त हुआ। इसे धारण करने से सकारात्मक उर्जा मिलती है। रुद्राक्ष को कलाई, गले और हृदय पर धारण किया जा सकता है। गले में धारण करना सबसे बेहतर है।

    लेकिन इसे कलाई में 12, गले में 36 और ह्रदय पर 108 दानों के साथ भी धारण कर सकते हैं। जो भी व्यक्ति रुद्राक्ष धारण करता है उसे सात्विक रहना चाहिए। नहीं तो इसका प्रभाव निष्फल हो जाता है।

    जन्म कुंडली में शनि पीड़ा को दूर करने के लिए दस मुखी रुद्राक्ष धारण करना चाहिए। इसे शनिवार को लाल धागे में गले में धारण करें। वहीं, कुंडली में शनि का अशुभ प्रभाव हो तो एक मुखी और ग्यारह मुखी रुद्राक्ष एक साथ धारण करें। ज्योतिष ग्रंथों में वर्णन मिलता है कि इन उपायों से कुंडली में शनि के अशुभ योग भी समाप्त हो जाते हैं।

    तनाव और रोगों को दूर करने में सहायक

    पंचमुखी रुद्राक्ष सबसे सुरक्षित विकल्प है जो हर किसी स्त्री, पुरुष, बच्चे, हर किसी के लिए अच्छा माना जाता है। यह सेहत और सुख की दृष्टि से भी फायदेमंद हैं, जिससे रक्तचाप नीचे आता है और स्नायु तंत्र तनाव मुक्त और शांत होता है।

    रुद्राक्ष से रोगों का उपचार करने के तरीके

    हमारे धर्मग्रंथों और चिकित्सा आधारित ग्रंथों में उल्लेखित हैं। यदि आमाशय में किसी तरह का विकार हो तो तांबे के किसी पात्र में जल भरकर सिरहाने रखें और उसमें पंचमुखी रुद्राक्ष के पांच दाने डाल दें। सुबह उठकर उस जल को पी लें और अगले दिन पुनः यह करें। जब तक रोग ठीक न हो करते रहें।

    वैज्ञानिक कर चुके हैं प्रमाणित

    सेंट्रल काउंसिल ऑफ आयुर्वेदिक रिसर्च नई दिल्ली में 1966 में आयुर्वेदिक औषधि में प्रकाशित किया गया है इसमें रुद्राक्ष थैरेपी की चर्चा की गई थी। अस्सी के दशक में बनारस के इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के वैज्ञानिकों ने डॉ. एस. राय के नेतृत्व में रुद्राक्ष पर अध्ययन कर इसके विद्युत चुंबकीय, अर्धचुंबकीय तथा औषधीय गुणों को सही पाया।

    वैज्ञानिकों ने माना है कि इसकी औषधीय क्षमता विद्युत चुंबकीय प्रभाव से पैदा होती है। रुद्राक्ष के विद्युत चुंबकीय क्षेत्र एवं तेज गति की कंपन आवृत्ति स्पंदन से वैज्ञानिक भी आश्चर्य चकित हैं।

    भारतीय वैज्ञानिक डॉ. एस.के. भट्टाचार्य ने 1975 में रुद्राक्ष के फार्माकोलॉजिकल गुणों का अध्ययन कर बताया कि कीमोफार्माकोलॉजिकल विशेषताओं के कारण यह हृदयरोग, रक्तचाप एवं कोलेस्ट्रॉल स्तर नियंत्रण में प्रभावशाली है। स्नायुतंत्र (नर्वस सिस्टम) पर भी यह प्रभाव डालता है एवं संभवत: न्यूरोट्रांसमीटर्स के प्रवाह को संतुलित करता है।

    ऐसे करें रुद्राक्ष धारण

    गले में 32 रुद्राक्षों की माल, सिर 40 रुद्राक्षों की माला, कानों में 6 या 8 रुद्राक्षों की माला, चोटी की जगह 1 वक्षस्थल पर 108 रुद्राक्षों की माला धारण करने की विधि ही रुद्राक्ष धारण पद्धति कहलाती है। वर्तमान में गले में 108 या 32 रुद्राक्ष पहनने की प्रथा है। शिवपूजन के समय रुद्राक्ष धारण करने की विधि की जाती है।

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