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    धनतेरस आज, ऐसे करें मां लक्ष्मी, कुबेर और धनवंतरि की पूजा, पढ़ें पूरा विधान

    Published: Tue, 17 Oct 2017 10:19 AM (IST) | Updated: Wed, 18 Oct 2017 01:10 PM (IST)
    By: Editorial Team
    laxmi kuber 17 10 2017

    मल्टीमीडिया डेस्क। शाम को पूजा करने पर विशेष फल मिलता है। पूजा के स्थान पर उत्तर दिशा की तरफ भगवान कुबेर और धनवंतरी की स्थापना कर उनकी पूजा करनी चाहिए। इनके साथ ही माता लक्ष्मी और भगवान की भी पूजा का विधान है। भगवान कुबेर को सफेद मिठाई का भोग लगाना चाहिए, जबकि धनवंतरी को पीली मिठाई और पीली चीज प्रिय है। पूजा में फूल, फल, चावल, रोली-चंदन, धूप-दीप का उपयोग करना चाहिए।

    शाम को परिवार के सभी सदस्य इकट्ठा होकर प्रार्थना करें। सबसे पहले विघ्नहर्ता भगवान गणेश की पूजा करें। उन्हें स्नान कराने के बाद चंदन या कुमकुम का तिलक लगाएं। भगवान को लाल वस्त्र पहनाकर भगवान गणेश की मूर्ति पर ताजे फूल चढ़ाएं। धनतेरस के अनुष्ठानों को शुरू करने से पहले इस मंत्र को पढ़ें-

    वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ ।

    निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा ॥

    अर्थ- इस मंत्र का अर्थ है कि हे गणेश जी! आप महाकाय हैं। आपकी सूंड वक्र है। आपके शरीर से करोडों सूर्यो का तेज निकलता है। आपसे प्रार्थना है कि आप मेरे सारे कार्य निर्विध्न पूरे करें।

    इसके बाद आयुर्वेद के संस्थापक भगवान धनवंतरी की पूजा की जाती है। लोग अपने परिवार के अच्छे स्वास्थ्य और भलाई के लिए प्रार्थना करते हैं। भगवान धनवन्त्री की मूर्ति को स्नान कराने और अभिषेक करने के बाद, 9 तरह के अनाज चढ़ाए जाते हैं। इसके साथ ही इस मंत्र का जाप किया जाता है...

    ॐ नमो भगवते महा सुदर्शनाया वासुदेवाय धन्वन्तरये अमृत कलश हस्ताय सर्व भय विनाशाय सर्व रोग निवारणाय त्रैलोक्य पतये त्रैलोक्य निधये श्री महा विष्णु स्वरूप श्री धन्वंतरि स्वरुप श्री श्री श्री औषध चक्र नारायणाय स्वाहा।

    अर्थ- हम उस धन्वन्तरि भगवान की पूजा करते हैं, जो सुदर्शन वासुदेव धनवंतरि हैं। उनके हाथ में अमर करने वाला अमृत का कलश है। वह सभी प्रकार के भय और बीमारियों को दूर करे वाले हैं। वह तीनों लोकों के कल्याण करने वाले और उनका संरक्षण करने वाले हैं। भगवान विष्णु की तरह ही धनवंतरि भी हमारी आत्मा को सशक्त करते हैं। हम आयुर्वेद के भगवान के सामने नतमस्तक होते हैं।

    कुबेर की पूजा

    कुबेर देव को धन का अधिपति कहा जाता है। माना जाता है कि पूरे विधि- विधान से जो भी कुबेर देव की पूजा करता है उसके घर में कभी धन संपत्ति की कभी कमी नहीं रहती है। कुबेर देव की पूजा सूर्य अस्त के बाद प्रदोष काल में करनी चाहिए। वरना पूजा का उचित फल प्राप्त नहीं होता है। इस मंत्र का जाप करें-

    ऊँ यक्षाय कुबेराय वैश्रवणाय धनधान्याधिपतये धनधान्यसमृद्धिं में देहि दापय।

    अर्थ- यक्ष के देवता कुबेर हमें संपत्ति और समृद्धि दें।

    लक्ष्मी की पूजा

    सूर्य अस्त होने के बाद करीब दो से ढ़ाई घंटों का समय प्रदोष काल माना जाता है। धनतेरस के दिन लक्ष्मी की पूजा इसी समय में करनी चाहिए। अनुष्ठानों को शुरू करने से पहले नए कपड़े के टुकड़े के बीच में मुट्ठी भर अनाज रखा जाता है।

    कपड़े को किसी चौकी या पाटे पर बिछाना चाहिए। आधा कलश पानी से भरें, जिसमें गंगाजल मिला लें। इसके साथ ही सुपारी, फूल, एक सिक्का और कुछ चावल के दाने और अनाज भी इस पर रखें। कुछ लोग कलश में आम के पत्ते भी रखते हैं। इसके साथ ही इस मंत्र का जाप करें-

    ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद, ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्मयै नम:॥

    इसके बाद एक प्लेट में लक्ष्मी जी की प्रतिमा का पंचामृत (दूध, दही, घी, मक्खन और शहद का मिश्रण) से स्नान कराएं। इसके बाद देवी चंदन लगाएं, इत्र, सिंदूर, हल्दी, गुलाल आदि अर्पित करें। परिवार के सदस्य अपने हाथ जोड़कर सफलता, समृद्धि, खुशी और कल्याण की कामना करें।

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