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    मन पर नियंत्रण के लिए करें श्रावण में शिव पूजन

    Published: Sat, 23 Jul 2016 01:52 PM (IST) | Updated: Sun, 24 Jul 2016 05:03 AM (IST)
    By: Editorial Team
    shivasavan 23 07 2016

    वर्ष 2016 श्रावण में हैं 4 सोमवार : श्रावण शिवजी को अतिप्रिय है। यह ऐसा महीना है जिसका नाम सुनने (श्रवण करने) से ही उद्धार हो जाता है। मान्यता है कि इस मास भगवान शिव अपने ससुराल जाने के लिए पृथ्वी पर आते हैं और यह अवसर उनकी कृपा आने का सुंदर संयोग रचता है।

    सभी मासों में श्रावण मास शिवजी को अति प्रिय है। संभवत: यही वजह है कि इसे विभिन्ना मासों में उत्तम मास कहा जाता है। इस मास का एक भी दिन ऐसा नहीं है जबकि व्रत रखने से विशेष फल की प्राप्ति न होती हो। हर दिन की अपनी अनूठी महिमा है। श्रावण, श्रवण नक्षत्र और सोमवार से भगवान शिव जुड़े हैं।

    वे स्वयं अपने मुख से सनतकुमार से कहते हैं कि मुझे 12 महीनों में श्रावन अति प्रिय है। इस मास का महत्व श्रवण योग्य होने के कारण ही इसे श्रावण मास कहा गया है। इस मास के श्रवण से ही सिद्धि प्राप्त होती है। श्रावण मास व श्रवण नक्षत्र के स्वामी चंद्र हैं और चंद्र के स्वामी हैं भगवान शिव। यही वजह है कि इस मास में उनकी कृपा या उनका आशीष पाने के लिए भक्तजन उन्हें प्रसन्ना करने के लिए हरसंभव प्रयास करते हैं।

    जब सनत कुमारों ने भगवान शिव से सावन महीना प्रिय होने का कारण पूछा था तो भगवान भोलेनाथ ने बताया था कि देवी सती ने अपने पिता दक्ष के घर में योगशक्ति से शरीर का त्याग किया था, उससे पहले उन्होंने महादेव को पति रूप में पाने का प्रण लिया था। दूसरे जन्म में सती ने पार्वती के नाम से हिमाचल और रानी मैना के घर में पुत्री के रूप में जन्म लिया। पार्वती ने श्रावण मास में निराहार रहकर कठोर व्रत किया और शिव को प्रसन्न कर उनसे विवाह किया।

    तभी से यह माह शिवजी को विशेष रूप से प्रिय हो गया। एक अन्य कथा के अनुसार मरकंडू ऋषि के पुत्र मार्कण्डेय ने श्रावण मास में ही लंबी आयु पाने के लिए घोर तप करके शिवकृपा प्राप्त की थी। शिवकृपा से उन्हें ऐसी शक्तियां मिलीं कि उनके सामने यमराज भी परास्त हो गए थे। एक कथा यह भी है कि श्रावण मास में ही शिव पृथ्वी पर अवतरित होकर अपनी ससुराल गए थे और वहां उनका स्वागत जलाभिषेक से हुआ था।

    माना जाता है कि हर वर्ष श्रावण मास में शिवजी अपनी ससुराल आते हैं। यही वजह है तब शिव जलाभिषेक करके भक्त उनकी कृपा पाने का प्रयास करते हैं। पौराणिक कथाओं में वर्णन है कि श्रावण मास में ही समुद्र मंथन हुआ था और निकलने वाले विष को शिवजी ने अपने कंठ में समाहित कर सृष्टि की रक्षा की थी। विष के प्रभाव को कम करने के लिए देवताओं ने उन्हें जल अर्पित किया था और तभी से श्रावण मास में शिवजी को जल अर्पित किया जाता है।

    सोमवार व्रत क्यों विशेष

    सोमवार का व्रत करने से शिवजी प्रसन्ना होते हैं और उस पर भी श्रावण मास के सोमवार का व्रत तो अमोघ फल देने वाला है। सोमवार का अंक 2 होता है जो चंद्रमा का प्रतिनिधित्व करता है। फिर चंद्रमा का एक नाम सोम भी प्राप्त होता है। चंद्रमा मन का संकेतक है। वह मनुष्य की चंचलता को बताता है।

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    यही चंद्रमा जो मनुष्य के चित्त को स्थिर नहीं होने देता है वह भगवान शंकर के मस्तक पर शोभा पाता है और उन्हीं के अधीन भी रहता है। जिन लोगों को एकाग्रता और मन की चंचलता के कारण मुश्किलों का सामना करना पड़ता हो उनके लिए श्रावण सोमवर व्रत का विशेष महत्व हो जाता है। भगवान शंकर की आराधना व्यक्ति को मन को साधने का वरदान देती है।


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