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    इस तरह करें करवाचौथ का व्रत

    Published: Wed, 08 Oct 2014 04:21 PM (IST) | Updated: Sat, 11 Oct 2014 11:21 AM (IST)
    By: Editorial Team
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    कार्तिक मास की कृष्णपक्ष की चौथ को करवाचौथ का मनाया जाता है। इस बार यह त्‍योहार 11 अक्‍टूबर को शनिवार के दिन पड़ रहा है। इस व्रत को करकरा वृत और करक चतुर्थी भी कहा जाता है। इस व्रत को सौभाग्यवती सुहागन स्त्रियां अपने पति की लंबी आयु के लिए करती हैं।

    करवा चौथ व्रत में प्रयोग होने वाला शब्द करवा दरअसल मिट्टी का वह छोटा पात्र है, जिसमें पूजा के समय जल गेहूं मिष्ठान आदि रखा जाता है। यह व्रत 12 वर्ष तक अथवा 16 वर्ष तक लगातार हर वर्ष किया जाता है। अवधि पूरी होने के पश्चात इस व्रत का उद्यापन किया जाता है, जो सुहागिन स्त्रियां आजीवन रखना चाहें वे जीवनभर इस व्रत को कर सकती हैं।

    पूजन विधि

    सौभाग्यवती स्त्रियां व्रत से एक दिन पहले सिर धोकर स्नान करने के बाद हाथों में मेंहदी और पैरों में माहुर( आलता) लगाती हैं। चतुर्थी के दिन सुबह लगभग 4 बजे उठकर ये महिलाएं सूर्योदय से पूर्व सास द्वारा दिया गया भोजन करती हैं। इस भोजन में दूध फल और मिठाई आदि व्यंजन होते हैं। सूर्योदय के पहले किया गया ये भोजन सरगही या सरगी कहलाता है।

    इसके बाद स्नान आदि से निवृत होकर महिलाएं सुहागिन का पूरा श्रंगार करती हैं। वह सिंदूर, मांग, टीका लाल रंग की चूड़ियां पैरों में आलता या मेहंदी, पायल आदि पहनकर तैयार होती हैं। साड़ी लाल या गुलाबी रंग की होती है। शाम को 3-4 बजे आंगन या छत पर पूजा करने के स्थान को धोकर साफ किया जाता है।

    वहां स्वास्तिक बनाया जाता है। एक कटोरी में चावल, रोली, मोली आदि रखते हैं। एक गिलास में स्वच्छ जल रखा जाता है। करवे में स्वच्छ जल भरते हैं। करवे में कहीं-कहीं द्वव्य रखने का प्रचलन है। करवे के ऊपर कहीं गेहूं, कहीं चीनी कहीं चौदह मालपुए रखने की प्रथा है।

    करवे पर रोली लगाकर मौली बांधी जाती है। एक पात्र में गौर (पार्वती जी) स्थापित करके हल्दी का तिलक लगाते हुए अक्षत चढ़ाया जाता है। पारिवारिक एकता की दृष्टि से भी इस त्योहार का अधिक महत्व है क्योंकि परिवार की सभी महिलाएं एक साथ बैठकर इस व्रत को करती हैं। इस प्रकार सालभर के गिले शिकवे दूर हो जाते हैं।

    ऐसे बदले जाते हैं करवे

    दो महिलाएं साथ में बैठकर पूजा करते हुए अपने करवे बदलती हैं और कहती हैं -'करवा ले, करवा ले, सदा सुहागन करवा ले, सात भाई की बहन करवा ले, करवा ले. करवा ले. सात पुत्रों की मां करवा ले' यदि कहीं पूजा करने वाली स्त्री अकेली हो तो वह दो करवे संजोकर एक गौर के सामने रखकर और एक अपने आगे रखते हुए फिर इस प्रक्रिया को करके करवे बदल सकती है।

    करवा चौथ की कहानी इसी समय सुनी जाती है। यह कहानी सुनते समय स्त्रियां हाथ में बिना टूटे हुए चावल के दाने रखती हैं। एक कहानी पूरी होने के बाद ये दाने अपने आंचल में बांधकर दूसरी कहानी सुनती हैं।

    कथा पूरी होने पर भाभी द्वारा ननद को करवे दिए जाते हैं। फिर चावल के दाने और जल से सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। उन्हें नमन किया जाता है। और घर के सभी वरिष्ठ सदस्यों के चरण स्पर्श किए जाते हैं।

    रात को सोलह श्रंगार करके चंद्रोदय होने पर छन्नी से चंद्रमा को अर्घ्य दिया जाता है। फिर अपने पति का चेहरा देखा जाता है। इसके बाद पति-पत्नी को जल पिलाकर उसका व्रत तुड़वाता है।

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