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    गुरु तलाश रहे हैं, तो ये बातें जरूर जानें नहीं होंगे निराश

    Published: Sat, 08 Jul 2017 05:58 PM (IST) | Updated: Mon, 10 Jul 2017 03:34 PM (IST)
    By: Editorial Team
    gurupurinamaji 08 07 2017

    - प्रभा पारीक

    गुरु यानी वह व्यक्ति जो हमें आशंकाओं को दूर करता है। हमारे अज्ञान को अपने ज्ञान के प्रकाश से दूर हटाता है। गुरु हमारे दोषों को दूर करके हमारे गुणों का विकास करते हैं। गुरु पूर्णिमा इन्हीं गुरुओं की महत्ता को रेखांकित करती है।

    आषाढ़ मास के अंतिम दिन अर्थात पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा मनाई जाती है। यह गुरु की महत्ता को रेखांकित करने वाला त्योहार है। गुरु पूर्णिमा के दिन महाभारत के रचयिता कृष्ण द्वैपायन व्यास की जन्म माना जाता है। वह संस्कृत के प्रकांड पंडित और चारों वेदों के रचनाकार थे। वेदों की रचना के कारण ही उन्हें वेद व्यास भी कहा जाता है।

    वेदों की रचना करके समस्त संसार को राह दिखाने के कारण ही आपका जन्मदिवस गुरु पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है। वेद व्यास आदि गुरु भी कहे जाते हैं। उनके सम्मान में ही गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है। शास्त्रों में गुरु का अर्थ बताया गया है कि वह व्यक्ति जो अंधकार या मूल अज्ञान का निवारण करता है।

    इस अर्थ में गुरु हमारे जीवन में ज्ञान का प्रकाश लेकर आते हैं। हमारे जीवन में अंधकार को दूर करके प्रकाश की ओर ले जाने वाले गुरुओं की अहम भूमिका है। ऐसे गुरु का चुनाव कैसे करें जो आपको सही राह दिखा सकें तो उसका तरीका यही है कि आपके भीतर सही राह तलाशने की बेचैनी होना चाहिए। बेचैनी होगी तो गुरु अपने-आप ही मिल जाएंगे।

    महर्षि वाल्मीकि का पूर्व नाम रत्नाकर था। वह अपने परिवार का पालन-पोषण करने हेतु दस्यु कर्म करते थे। जब उन्हें नारद रूपी गुरु मिले तो उन्होंने रामायण जैसे महाकाव्य की रचना की और महर्षि वाल्मीकि कहलाए। गुरु विष्णु शर्मा ने जिस तरह राजा अमर शक्ति के तीन अज्ञानी पुत्रों को कहानियों के माध्यम से ज्ञानी बनाया वह अनुपम मिसाल है।

    स्वामी विवेकानंद को बचपन में परमात्मा को पाने की चाह थी उनकी यह इच्छा तभी पूरी हो सकी जब उन्हें गुरु परमहंस का आशीर्वाद मिला। गुरु की कृपा से उन्हें आत्म-साक्षात्कार हुआ।

    छत्रपति शिवाजी पर अपने गुरु समर्थ रामदास का प्रभाव हमेशा रहा। कबीर दास जी का अपने गुरु के प्रति जो समर्पण था उसे सपष्ट करते हुए हम यह कह सकते हैं क्यो कि गुरु के महत्व के सबसे ज्यादा दोहे कबीर ने ही कहे हैं।

    एक बार रामानन्द जी गंगा स्नान को जा रहे थे सीढ़ी उतरते समय उनका पांव कबीर दास जी के शरीर पर पड़ गया उनके मुख से शब्द निकले राम-राम और उसी शब्द को कबीर दास जी ने दीक्षा-मंत्र मानकर रामानंद जी को गुरु रूप में स्वीकार कर लिया।

    रामानंदजी का मत था कि ईश्वर मनुष्य के भीतर ही है और इसी बात को कबीर ने भी आगे बढ़ाया। गुरु का स्थान ईश्वर से भी बढ़कर है क्योंकि वह अपने शिष्य का पूरा ही जीवन बदलकर रख देता है। आचार्य चाणक्य ने अपनी विद्वत्ता के बल पर नंद वंश का नाश किया और चंद्रगुप्त मौर्य को शासक के पद पर बैठा दिया।

    गूढ़ अर्थ है आषाढ़ की पूर्णिमा

    आषाढ़ पूर्णिमा या गुरु पूर्णिमा के गूढ़ अर्थों को भी हमें समझना चाहिए। इस पूर्णिणा को विशेष महत्व दिया जाने का निहितार्थ है। वैसे देखा जाए तो आषाढ़ मास में आने वाली पूर्णिमा तो पता भी नहीं चलती है। आषाढ़ में आकाश में बादल घिरे हो सकते हैं और इस बात की संभावना ज्यादा है कि चंद्रमा के दर्शन तक न हो पाएं।

    जब चंद्रमा का प्रभास ही नहीं तो पूर्णिमा का अर्थ ही क्या? पूर्णिमा पर चंद्रमा का प्रकाश देखना हो तो शरद पूर्णिमा को निहारिए। उस दिन चंद्रमा की सुंदरता मन को मोह लेती है।

    मगर फिर भी दोनों के बीच तुलना की जाए तो महत्व आषाढ़ पूर्णिमा का ही अधिक है। यह इसलिए क्योंकि यहां गुरु पूर्णिमा के चंद्रमा की तरह प्रकाशमान हैं और शिष्य आषाढ़ के बादलों की तरह। आषाढ़ में चंद्रमा बादलों से घिरा रहता है जैसे गुरु शिष्यों से घिरे हों।

    शिष्य हर तरह के हो सकते हैं। वे ज्ञान की तलाश में गुरु के पास आए हैं इसलिए वे अपने साथ अंधेरा लाए हैं। उनकी तुलना अंधेरे बादलों से ठीक बैठती है। मगर इन बादल रूपी शिष्यों के बीच भी गुरु चमक सके तभी तो उनकी महत्ता है।

    गुरु पद की श्रेष्ठता इसी में है कि वह अंधेरे से घिरे वातावरण में भी प्रकाश की जगमगाहट कर सके। इसलिए आषाढ़ पूर्णिमा को श्रेष्ठतम माना जाता है। इसमें गुरु और शिष्य दोनों के लिए इशारा है। दोनों एक दूसरे का अवलंब हैं। दोनों मिलकर ही सार्थक होते हैं।

    ये हैं दस गुरु

    आचार्यपुत्र: शुश्रूषुर्ज्ञानदो धार्मिक: शुचि:।

    आप्त: शक्तोर्थ: साधु: स्वाध्याप्योदश धर्मत:।।

    इस श्लोक में दस तरह के गुरु बताए गए हैं जिनसे हम बहुत कुछ सीख सकते हैं। ये इस तरह हैं-

    1- आचार्य पुत्र

    2- सेवक या सेवा करने वाला

    3- शिक्षा देने वाले अध्यापक

    4- धर्मात्मा

    5- पवित्र आचरण करने वाला

    6- सच बोलने वाला

    7- समर्थ पुरुष

    8- नौकरी देने वाला

    9- परोपकार करने वाला

    10- भला चाहने वाले संबंधी

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