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    चांद तो एक बहाना है, साथ जो हमें निभाना है

    Published: Tue, 07 Oct 2014 12:14 PM (IST) | Updated: Sat, 11 Oct 2014 10:10 AM (IST)
    By: Editorial Team
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    - डॉ. सरोज कोठारी

    शरद का चांद हो और पति की दीर्घायु की कामना का व्रत करवा-चौथ, भावनाएं वहीं है, उत्साह भी वही है, व्रत की परंपराएं भी वही हैं। बस थोड़ा-सा बदला हुआ है कि अब व्रत का स्वरूप पारस्परिक हो फिर से कार्तिक माह है, फिर से कृष्ण पक्ष और फिर से उसकी चतुर्थी... अंधेरी रातों की तरफ बढ़ते हुए चौथा दिन।

    उत्तर भारत की महिलाओं का प्रमुख त्योहार है करवा-चौथ...। पति के कुशल-मंगल, सुख-समृद्धि और दीर्घायु होने की कामना से किया जाने वाला व्रत करवाचौथ।

    कुछ कहानियां, व्रत, सजना-संवरना, व्यंजन, हंसी ठिठौली, बहुत सारी भावनात्मकता और पारिवारिकता का व्रत करवा-चौथ।

    चाहे स्त्रीवादी कुछ भी कह लें, हमारी परंपराओं के अति हमारी आस्था और पारिवारिक भावनाओं के चलते करवा-चौथ का प्रचलन अब देश के उन हिस्सों में भी होने लगा है, जहां इस व्रत की कोई परंपरा नहीं थी।

    वजह चाहे जो हो, बाजार हो, ग्लैमर हो, प्रचार-प्रसार हो, लेकिन करवा-चौथ अब भारतीय संस्कृति का सबसे मुखर प्रतीक होता चला जा रहा है।

    बदला है स्वरूप प्रचार-प्रसार के साधनों और इस व्रत से जुड़े ग्लैमर ने इस व्रत को महिलाओं द्वारा किए जाने वाले सबसे अनिवार्य व्रत का रूप दे दिया है।

    धार्मिक तौर पर शुरू हुए इस व्रत में धीरे-धीरे भावना, समर्पण, प्रेम, ऊर्जा और रस का समावेश होने लगा। कभी करवा-चौथ का व्रत और पूजन आस्था और परंपरा की किया जाता होगा, लेकिन इन कुछ सालों में इसमें रस, रंग और सौंदर्य का समावेश हुआ है। यह सामाजिक बदलाव के सकारात्मक प्रतीक के तौर पर उभर कर आया है।

    अब ये सिर्फ व्रत-पूजन-विधान तक ही सीमित नहीं है। एक-दूसरे के प्रति भावना का प्रदर्शन, बड़ों के प्रति ऊष्मा की अभिव्यक्ति, खुद के लिए वक्त और रिश्तेदारों के साथ मिलने, वक्त बिताने के दिन की तरह करवा-चौथ का उत्सव हुआ करता है।

    कई आयाम जुड़े हैं, अब इस तरह के मामले भी सामने आने लगे हैं जिसमें पति-पत्नी दोनों ही एक-दूसरे के लंबे और स्वस्थ जीवन के लिए साथ-साथ व्रत करते हैं।

    जो भी हो करवा-चौथ के ग्लैमर ने इसे हमारी परंपरा का बहुत महत्वपूर्ण उत्सव का रूप दे दिया। हम इस विचार से आगे आ गए हैं कि इसका संबंध सिर्फ पति की मंगल कामना और दीर्घायु से ही है। ये पारिवारिक सुख-समृद्धि और पारिवारिक उत्सव का भी मौका हुआ करता है।

    सबके लिए मंगल कामना हमारे यहां रिश्ते और परिवार सुखी जीवन के लिए सांस की तरह हुआ करते हैं। ये न सिर्फ सामाजिक सच है, बल्कि मनोवैज्ञानिक सच भी है। पारिवारिक सुख इंसान को कई मुश्किलों, तनावों और दबावों से बचाता है और उसे सहने की क्षमता देता है।

    परिवार की शुरुआत होती है दांपत्य जीवन से... दांपत्य जीवन के सुखी-संतुष्ट होने पर ही पारिवारिक खुशी निर्भर करती है। बदली भूमिका में बदला अर्थ स्त्री की भूमिका में बड़ा और क्रांतिकारी बदलाव आया है। पारंपरिक समाज के सारे मूल्य, व्यवस्था, दर्शन और विचार सबकुछ पुराने हो चले हैं।

    ऐसे में करवा-चौथ जैसे त्योहारों पर उत्साह हमें अचंभित करता है।पढ़ाई-लिखाई और आत्मनिर्भरता से स्त्रियों का व्यक्तित्व प्रखर हुआ है और सोचने का तरीका बदला है। बहुत बदलाव के बावजूद अब भी हमारे लिए पारिवारिक जीवन हमारी हर प्राथमिकता से ऊपर होता है। हमारे समाज की स्त्री सामंजस्य की हरसंभव कोशिश करती है और जरूरत पड़ने पर अपनी शिक्षा को एक तरफ रखकर अपनी महत्वाकांक्षा तक छोड़ देती है। ऐसे पुरुष की भूमिका में बदलाव भी अपेक्षित है...

    क्योंकि सामंजस्य के लिए दो पक्षों की जरूरत हुआ करती है। पूरे बदलाव को अकेले साध पाना स्त्री के अकेले के बस की बात नहीं है। और यहीं आकर करवा-चौथ के संदर्भ भी बदलते हैं और "ङसंग भी। बदलते वक्त में सामाजिक बदलाव आवश्यक है। स्त्री के पढ़ने-लिखने और कमाने के बाद सामाजिक संरचना में मूलभूत बदलाव आ ही रहे हैं।

    बदलाव कैसे भी हों, असुविधाजनक हुआ करते हैं। स्त्री अपनी दोहरी भूमिका के बदले पारिवारिक सहयोग और सामंजस्य की अपेक्षा रखती है। अपेक्षाओं का भी विस्तार व्रत-पूजन, विधान इस सबका सार एक ही जगह आकर टिकता है... दांपत्य जीवन की सफलता और उसकी दीर्घायु। जब तक परिवार का ढांचा पारंपरिक था, पारिवारिक मूल्य बहुत दृढ़ थे और हर जगह वे ही पथ-प्रदर्शक हुआ करते थे।

    रिश्तों में किसी तरह की जटिलता नहीं थी, हर चीज सहज और सरल थी। आधुनिकता की बयार में बदले रिश्तों की वजह से परिवर्तन की जरूरत भी बढ़ी है और ये परिवर्तन बहु आयामी हुए हैं। अब पत्नी की तरह ही पुरुष भी पत्नी की जरूरतों, आकांक्षाओं और महत्वाकांक्षाओं के साथ सामंजस्य कर रहे हैं।

    महिलाओं के साथ सहयोग कर रहे हैं। बदले हुए वक्त में वे भी अपनी भूमिका में संशोधन करके समाज और परिवार को वक्त का हमकदम बनाने में हिस्सेदारी कर रहे हैं। तभी तो करवा-चौथ अब व्रत-पूजन से आगे जाकर भावना और आस्था का प्रतीक हो रहा है।

    तभी तो आधुनिकाएं भी अपने बिज़ी शेड्यूल में से करवा-चौथ के लिए वक्त निकालती हैं, गिफ्ट्स खरीदती हैं, सजती-संवरती है, रिश्तों में ऊष्मा प्रवाहित करती है और पति की मंगल-कामना में अपनी और अपने परिवार को भी हिस्सेदारी देती हैं।

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