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    हम कौन हैं? ये जानने के लिए कीजिए, यह अचूक उपाय

    Published: Fri, 17 Feb 2017 11:25 AM (IST) | Updated: Sat, 18 Feb 2017 10:03 AM (IST)
    By: Editorial Team
    good-medition 17 02 2017

    -राजयोगी ब्रह्माकुमार निकुंजजी

    हमें यह सीखना चाहिए की जीवन के गूढ़ प्रश्नों का उत्तर जो हमें आंतरिक शांति दे सकता है, उसे बाह्य वस्तुओं में बीच खोजना निरर्थक है. उसके लिए चाहिए एकांत जहां मनुष्य निर्विघ्न होकर प्रश्नों की गहराइयों में डूब जाए और विचारों के उमड़ते हुए समुद्र में से सत्य की सीपी ढूंढ़कर बाहर निकल आए.

    यह एक सर्वविदित तथ्य है कि हम सभी इस दुनिया में अकेले आये हैं और अकेले ही जाएंगे. दुनिया का कोई भी मनुष्य हो, चाहे वह कितना भी अमीर हो या कितना भी गरीब,परंतु वह चाहकर भी अपने साथ कुछ भी ले नहीं जा सकता. जब हम सभी इस हकीकत से वाकिफ हैं, तो फिर इतना सब संचय करने की आवश्यकता क्या है?

    यथार्थ तरीके से अपना जीवन कैसे जीना चाहिए, यह हमें प्राचीनकाल के ऋषियों के जीवन से बखूबी सिखने मिलता है, क्योंकि सभी की तरह वे भी गृहस्थ थे, किंतु पारिवारिक जीवन में रहते हुए भी उन्होंने आत्म-तत्व की जो विशद व्याख्या की है, उसका मूलत: कारण वही था कि वे एकांत-चिंतन और आत्मशोधन के लिए भी पर्याप्त समय निकालते थे.

    अत: हमें यह सीखना और समझना चाहिए की जीवन के गूढ़ प्रश्नों का उत्तर जो हमें आंतरिक शांति दे सकता है, उसे बाह्य वस्तुओं में या शोरगुल के बीच खोजना निरर्थक है. उसके लिए चाहिए एकांत जहां मनुष्य निर्विघ्न होकर प्रश्नों की गहराइयों में डूब जाए और विचारों के उमड़ते हुए समुद्र में से सत्य की सीपी ढूंढ़कर बाहर निकल आए.

    हममे से अधिकांश लोग यह जानते ही नहीं की आत्मा को शरीर प्राप्त करने के बाद जो पहला संस्कार प्राप्त होता है, वह है एकांत में वास करने का. जी हां, सरल भाषा में कहें तो आत्मा लगभग चार माह के गर्भस्थ अविकसित शरीर में प्रवेश करती है और लगभग पांच मास तक का एकांत वास करती है.

    उस दौरान यदि उसे अपने पूर्व जन्म के श्रेष्ठ कर्मों की स्मृति रहती हैं, तो उसे गर्भ का एकांत कष्टप्रद नहीं लगता. इसके साथ-साथ उस पर अपनी माता की मन:स्थिति का भी प्रभाव पड़ता रहता है.

    मसलन, यदि माता शुभ, श्रेष्ठ संकल्पों में रहती है तो गर्भस्थ शिशु का एकांतवास भी श्रेष्ठ बन जाता है, पर यदि माता की अवस्था इसके विपरीत रहती है, तो शिशु को अंदर ही अदंर बहुत पीड़ा का अनुभव करना पड़ता हैं.

    विश्व भर के चिकित्सीय मनोवैज्ञानिकों के मतानुसार जो माता अपनी गर्भावस्था की संपूर्ण अवधि के दौरान शांत व सुखमय वातावरण के बीच रहकर आध्यात्मिक साधना में अपना ज्यादा से ज्यादा समय बिताती हैं, वह एक स्वस्थ और तेजस्वी बच्चे को जन्म देती है. आध्यात्मिक साधना में एकांत का बड़ा महत्व है.

    एकांत में मनुष्य अपने अंदर झांककर श्रेष्ठता के स्रोत का अनुभव कर सकता है, उसे जीवन में उतार सकता है. मनुष्य की आत्मा में जो अनेक मौलिक व दिव्य शक्तियां समाई हुई हैं, आज वह उनका प्रयोग इसलिए ही नहीं कर पाता क्योंकि उसने अपने जीवन में एकांत में जाना या रहना सीखा ही नहीं है. उसे अपने अन्दर की अलौकिक दिव्य दुनिया में छुपे हुए अतीन्द्रिय सुख को भोगने की सुध ही नहीं रहती है.

    संयोग से यदि वह कभी एकान्त में कहीं बैठ भी जाता है, तो अपने संस्कारवश वह पुन: बाह्य जगत की दुखदायी घटनाओं का ही चिंतन करने लगता है. ऐसा एकांत फिर उसे उदासी, विषाद में ले जाकर डिप्रेशन का मरीज बना देता है.

    स्वयं के एकांत स्वरूप को जानना सबसे जरूरी

    सर्वप्रथम हमें जरूरत हैं अध्यात्मिक साधना चिंतन द्वारा स्वयं के शान्त स्वरूप व एकान्त स्वरूप को जानने, पहचानने व अनुभव करने की, उसके पश्चात ही हम सही मायने में एकांत वास का लाभ उठा सकेंगे अन्यथा जिस मर्ज की हम दवाई करने जाएंगे, वह दवाई ही हमारे लिए जहर बन जाएगी.

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