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    जगमोहन डालमिया ने बीसीसीआई को बनाया था सबसे धनी बोर्ड

    Published: Sun, 20 Sep 2015 11:53 PM (IST) | Updated: Mon, 21 Sep 2015 04:00 AM (IST)
    By: Editorial Team
    dalmiya 20 09 2015

    विशाल श्रेष्ठ, कोलकाता। विकेटों के पीछे खड़ा रहने वाला एक नौजवान कभी भारतीय क्रिकेट को अपने बूते बहुत आगे ले जाएगा, शायद ही किसी ने ये सोचा था। वह शख्स कोई और नहीं, बल्कि जगमोहन डालमिया थे।

    क्रिकेट की दुनिया में जब भी बेहतरीन प्रशासकों की बात होगी तो पहला नाम यकीनन डालमिया का ही लिया जाएगा। भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) को दुनिया का सबसे धनी क्रिकेट बोर्ड बनाने में उनकी बड़ी भूमिका थी।

    बीसीसीआई में लंबी पारी खेलने वाले डालमिया बंगाल की क्रिकेट बिरादरी में "जग्गू दा" के नाम से मशहूर थे। डालमिया का बीसीसीआई से साढ़े तीन दशकों से भी पुराना नाता था।

    उन्होंने बीसीसीआई से भी आगे बढ़कर अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (आईसीसी) तक की कमान बखूबी संभाली। बहुत कम लोगों को मालूम है कि 30 मई, 1940 को कोलकाता के एक मारवाड़ी परिवार में जन्मे डालमिया कॉलेज के दिनों में क्रिकेटर थे। वह स्कॉटिश चर्च कॉलेज की क्रिकेट टीम के विकेटकीपर रहे।

    वह कई क्रिकेट क्लबों के लिए विकेटकीपर के रूप में खेले। इतना ही नहीं, वह एक बार दोहरा शतक भी जड़ चुके थे। इसके बाद वह अपने पिता की निर्माण कंपनी एमएल डालमिया एंड कंपनी से जुड़ गए। इसी कंपनी ने 1963 में एमपी बिरला प्लेनेटोरियम का निर्माण किया था।

    किस्मत को हालांकि कुछ और ही मंजूर था। बीसीसीआई के साथ डालमिया की जुगलबंदी 1979 में शुरू हुई। 1983 में जब भारतीय क्रिकेट टीम ने कपिल देव की कप्तानी में पहला क्रिकेट विश्व कप जीता, उसी साल वह बोर्ड के कोषाध्यक्ष नियुक्त हुए थे।

    दक्षिण एशिया में 1987 और 1996 में क्रिकेट विश्व कप के आयोजन का काफी श्रेय उन्हीं को जाता है। 1997 में वह निर्विरोध आईसीसी के अध्यक्ष चुने गए और तीन वर्षों तक उन्होंने यह पदभार संभाला। वह कई बार बीसीसीआई अध्यक्ष बने।

    कम बैक मैन

    जिंदगी में कभी न कभी बुरा वक्त सबका आता है। डालमिया भी अपवाद नहीं थे। बीसीसीआई में शरद पवार गुट के सक्रिय होने पर 2006 में डालमिया को फंड के गबन के आरोप में बीसीसीआइ से हटा दिया गया। लेकिन उन्होंने हार नही मानी और बांबे हाईकोर्ट और उसके बाद सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।

    डालमिया के खिलाफ कोई आरोप साबित नहीं हुआ। उन्हें क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ बंगाल (सीएबी) के अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ने से भी रोका गया। उन्होंने इस फैसले को भी कलकत्ता हाईकोर्ट में चुनौती दी। जुलाई, 2007 में कोर्ट ने उनके पक्ष में फैसला सुनाया।

    डालमिया ने चुनाव लड़ा और जीता भी और इसके साथ ही उन पर कंधे पर "कम बैक मैन" का तमगा लटक गया। जून, 2013 में एन श्रीनिवासन के अस्थायी तौर पर पद से हटने के बाद डालमिया बीसीसीआई के अंतरिम अध्यक्ष बने।

    इसके पीछे भी कहीं न कहीं उनका "मास्टर स्ट्रोक" था। इसी साल दो मार्च, 2015 को वह 10 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद फिर से बीसीसीआई अध्यक्ष बने थे और एक बार फिर उनसे बड़ी पारी की उम्मीद की जा रही थी, लेकिन उससे पहले ही वह "रिटायर्ड हर्ट" होकर लौट गए।

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