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    बगदाद से आए थे बाबा शहबाज कलंदर के पुरखे

    Published: Fri, 17 Feb 2017 09:38 PM (IST) | Updated: Fri, 17 Feb 2017 09:43 PM (IST)
    By: Editorial Team
    lal shahbaz qalandar shrine 17 02 2017

    इस्लामाबाद । लाल शहबाज कलंदर के पुरखे बगदाद से ईरान के मशद आकर बस गए थे। इसके बाद वे वहां से अफगानिस्तान के मरवांद चले गए जहां "दमादम मस्त कलंदर" वाले बाबा का जन्म हुआ।

    लाल शहबाज कलंदर फारसी जुबान के कवि रूमी के समकालीन थे। उन्होंने इस्लामी दुनिया का सफर किया और आखिर में सिंध के सेहवान आकर बस गए। उन्हें यहीं दफनाया भी गया।

    कहा जाता है कि 12वीं सदी के आखिर में वह सिंध आ गए थे। उन्होंने सेहवान के मदरसे में पढ़ाया और यहीं पर उन्होंने कई किताबें भी लिखीं। उनकी लिखी किताबों में मिजान-उस-सुर्फ, किस्म-ए-दोयुम, अक्द और जुब्दाह का नाम लिया जाता है। मुल्तान में उनकी दोस्ती तीन और सूफी संतों से हुई जो सूफी मत के "चार यार" कहलाए।

    कुछ इतिहासकार कहते हैं कि लाल शहबाज कलंदर ने दक्षिण भारतीय सूबों की यात्राएं भी कीं। वह मजहब के जानकार माने जाते थे और उन्हें तुर्की, सिंधी, पश्तो, फारसी, अरबी और संस्कृत में भी महारत हासिल थी।

    तकरीबन 98 साल की उम्र में 1275 में उनका निधन हुआ और उनकी मौत के बाद 1356 में उनकी कब्र के पास दरगाह का निर्माण कराया गया। उनके मकबरे के लिए ईरान के शाह ने सोने का दरवाजा दिया था।

    लाल शहबाज कलंदर की मजार पर उनकी बरसी के समय सालाना मेला लगता है जिसमें लाखों लोग शरीक होते हैं। कहते हैं कि सूफी कवि अमीर ख़ुसरो ने बाबा लाल शाहबाज कलंदर के सम्मान में ही "दमादम मस्त कलंदर" गीत लिखा था। बाद में इस गीत में बाबा बुल्ले शाह ने कुछ बदलाव किए थे।

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