वाशिंगटन। अमेरिका ने विदेशी मुद्राओं की खरीद को लेकर भारत को निगरानी सूची में डाल दिया है। अमेरिका का कहना है कि भारत ने 2017 की पहली तीन तिमाहियों में बहुत ज्यादा विदेशी मुद्रा खरीदी। यह खरीद किसी तरह से जरूरी नहीं थी। चीन, जापान, दक्षिण कोरिया, जर्मनी और स्विट्जरलैंड के बाद भारत इस निगरानी सूची में आने वाला छठा देश है।

अमेरिका के राजस्व विभाग की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत ने 2017 की पहली तीन तिमाहियों में विदेशी मुद्रा की बहुत ज्यादा खरीद की। चौथी तिमाही में गिरावट के बाद भी पूरे वर्ष के दौरान विदेशी मुद्रा खरीद 56 अरब डॉलर (करीब 3.65 लाख करोड़ रुपये) के स्तर पर रही। यह भारत के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 2.2 फीसद के बराबर है।'

रिपोर्ट में इस बात को भी रेखांकित किया गया कि विदेशी मुद्रा खरीद में यह वृद्धि ऐसे समय में हुई, जब प्रत्यक्ष विदेशी निवेश से लेकर पोर्टफोलियो निवेश तक विदेशी मुद्रा का प्रवाह स्वतः बढ़ा हुआ है। यह भी ध्यान देने की बात है कि खरीद बढ़ने के बाद भी इस दौरान डॉलर के मुकाबले रुपया छह फीसद मजबूत हुआ। 2017 में डॉलर के मुकाबले रुपये की प्रभावी मजबूती तीन फीसद की रही।

रिपोर्ट में कहा गया, 'यह देखते हुए कि सामान्य माध्यमों से भारत का विदेशी मुद्रा भंडार पर्याप्त है और निजी स्तर पर मुद्रा के आने-जाने पर भारत का सीमित नियंत्रण भी है, ऐसे में अतिरिक्त मुद्रा की खरीद की कोई जरूरत नहीं दिखाई पड़ती है।' राजस्व विभाग किसी देश द्वारा 12 महीने की अवधि में अपने जीडीपी के दो फीसद से ज्यादा की विदेशी मुद्रा की खरीद को एकतरफा हस्तक्षेप मानता है।

भारत और स्विट्जरलैंड दिसंबर, 2017 को समाप्त चार तिमाहियों के दौरान इस श्रेणी में आते हैं। हालांकि, अमेरिकी राजस्व विभाग ने विदेशी मुद्रा खरीद की जानकारी में पारदर्शिता को लेकर भारत के रवैये को अनुकरणीय बताया है।

राजस्व विभाग ने अमेरिकी कांग्रेस को बताया कि 2017 में अमेरिका के साथ व्यापार में भारत का ट्रेड सरप्लस उल्लेखनीय रूप से 23 अरब डॉलर (करीब 1.50 लाख करोड़ रुपये) रहा था। सेवा क्षेत्र में भी भारत का सरप्लस छह अरब डॉलर (करीब 39 हजार करोड़ रुपये) के बराबर रहा। वहीं इस दौरान भारत का चालू खाता घाटा उसके जीडीपी के 1.5 फीसद के बराबर रहा।

राजस्व विभाग ने बताया कि 2012 में ऊंचा स्तर छूने के बाद भारत के चालू खाता घाटा में गिरावट आई थी, लेकिन 2017 में यह उल्लेखनीय रूप से बढ़कर जीडीपी के 1.5 फीसद के बराबर हो गया। चालू खाते के घाटे में सोने और पेट्रोलियम आयात की बड़ी हिस्सेदारी रही।

कुछ साल पहले भारत सरकार की ओर से सोना आयात पर नियंत्रण के लिए नीतिगत मोर्चे पर उठाए गए कदमों और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की गिरती कीमतों के कारण चालू खाता घाटा नियंत्रित रहा था।