मुंबई। संसद में पूर्ण आम बजट पेश होने में केवल 15 दिन बचे हैं और आशंका है कि कमजोर मानसून आर्थिक चुनौतियां बढ़ाएगा। अब तक की स्थिति संकेत दे रही है कि इस साल बारिश कम होगी।

केरल में जहां करीब 7 दिन की देरी से मानसून ने दस्तक दी, वहीं जून में अब तक सामान्य से करीब 44 फीसदी कम बारिश हुई है।

देश के अन्य इलाकों में भी मानसून 10-13 दिनों की देरी से पहुंचने का अनुमान है। ऐसे में आशंका जताई जा रही है कि इस सीजन में बारिश सामान्य से कम होगी।

दरअसल, मॉनसून को बंगाल की खाड़ी में बनने वाला लो प्रेशर सिस्टम रफ्तार देता है। इसके जमीन तक पहुंचने पर बारिश होती है, लेकिन फिलहाल खाड़ी में यह सिस्टम दिखाई नहीं दे रहा है। मानसून में देरी से यह चिंता गहराने लगी है कि कहीं इस बार कम बारिश तो नहीं होगी।

2016 जैसे हालात नहीं

इससे पहले साल 2016 में मानसून ने 8 जून को केरल में दस्तक दी थी, लेकिन मध्य जून तक देश के ज्यादातर हिस्से को कवर कर लिया था और सामान्य बारिश हुई थी। लेकिन, इस बार ऐसा नहीं है।

मानसून की यह अहमियत

- देश में 70 प्रतिशत बारिश मॉनसून में होती है

- सोयाबीन, कपास, दलहन, चावल जैसी फसलें इस पर निर्भर होती हैं

- देश की अर्थव्यवस्था में खेती का योगदान 15 फीसदी है

- करीब 130 करोड़ में से आधी आबादी को कृषि क्षेत्र से रोजगार मिलता है।

सरकार के लिए चुनौती क्यों?

मॉनसून बेहतर रहने से पैदावार अच्छी रहती है, जिससे ग्रामीण इलाकों में आय बढ़ती है। इसकी बदौलत उपभोक्ता सामान की मांग में इजाफा होता है। सरकार का लक्ष्य किसानों की आय दोगुनी करना है। देश की सुस्त पड़ती अर्थव्यवस्था को भी पटरी पर लाना है। ऐसे में यदि इस साल कम बारिश होती है तो चुनौतियां बढ़ सकती हैं।

महंगाई, ब्याज दर पर असर

पैदावार कमजोर होने से खाने-पीने की चीजों की आपूति प्रभावित होगी और रिटेल में कीमतें नियंत्रित करना मुश्किल हो जाएगा। रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति पर भी इसका असर होगा। ब्याज दरों में कटौती की जगह बढ़ोतरी का सिलसिला शुरू हो सकता है।