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    US-China के ट्रेड वार में किसी का पक्ष नहीं लेगा भारत

    Published: Sun, 15 Apr 2018 10:55 PM (IST) | Updated: Sun, 15 Apr 2018 10:56 PM (IST)
    By: Editorial Team
    us china trade 15 04 2018

    बीजिंग। अमेरिका और चीन के बीच बनी ट्रेड वार की स्थिति में भारत किसी का पक्ष नहीं लेगा। चीन के साथ यहां स्ट्रैटिजिक इकनॉमिक डायलॉग (एसईडी) के बाद रविवार को नीति आयोग के उपाध्यक्ष राजीव कुमार ने यह बात कही। शनिवार को हुई वार्ता में चीन की विवादास्पद "वन बेल्ट वन रोड" को लेकर भी दोनों पड़ोसियों में मदभेद बना रहा।

    राजीव कुमार वार्ता में भारतीय दल का नेतृत्व कर रहे थे। बैठक में चीन के दल की अगुआई नेशनल डेवलपमेंट एंड रिफॉर्म कमीशन के चेयरमैन ही लिफेंग ने किया। ट्रेड वार की वर्तमान स्थिति पर भारत के रुख को लेकर राजीव कुमार ने कहा, "भारत नियम आधारित बहुपक्षीय व्यापार व्यवस्था का समर्थन करता है। इस लिहाज से हमें इधर या उधर किसी का पक्ष लेने की जरूरत नहीं है। भारत ने व्यापार के मुद्दे पर हमेशा स्वतंत्र रुख लिया है।" नीति आयोग के उपाध्यक्ष ने 1980 के दशक में अमेरिका और जापान के बीच के ट्रेड वार का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि उस समय अमेरिका ने जापान पर दबाव बनाकर व्यापार घाटा कम करने में सफलता हासिल की थी। अमेरिका अब भी इसी प्रयास में है। दोनों पक्ष इस दिशा में कदम बढ़ाते हुए भी दिख रहे हैं। कोई भी पक्ष ट्रेड वार जैसी स्थिति नहीं चाहता।

    गौरतलब है कि इस समय अमेरिका और चीन ट्रेड वार में उलझे हैं। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप चीन के साथ द्विपक्षीय कारोबार में 375 अरब डॉलर के व्यापार घाटे को दूर करने के लिए चीन पर दबाव बढ़ा रहे हैं। उन्होंने चीन से आयात किए जाने वाले इस्पात और एल्युमीनियम पर भारी-भरकम आयात शुल्क लगाया है। अमेरिकी कार्रवाई के बाद चीन ने भी अमेरिका से होने वाली कई वस्तुओं पर आयात शुल्क बढ़ाने का एलान कर दिया था। फिलहाल दोनों पक्ष बातचीत से हल निकालने के लिए तत्पर दिखाई दे रहे हैं।

    आरसीईपी पर अगले दौर की बैठक सिंगापुर में

    रीजनल कंप्रहेंसिव इकोनॉमिक पार्टनरशिप (आरसीईपी) पर अगले दौर की वार्ता इस महीने के अंत तक सिंगापुर में होगी। इसमें भारत और चीन समेत कुल 16 देशों के प्रतिनिधि शामिल होंगे। यह बातचीत का 22वां दौर होगा। आरसीईपी 16 देशों के बीच प्रस्तावित एक बड़ा कारोबारी समझौता है। इस पर सहमति बनने से इन देशों के बीच वस्तुओं व सेवाओं के व्यापार, निवेश, आर्थिक व तकनीकी सहयोग के नए रास्ते खुलेंगे।

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