नई दिल्ली। तेल-गैस निकालने वाली सरकारी कंपनी ओएनजीसी की 9 सबसे बड़ी तेल-गैस फील्ड को बेचने की योजना टाल दी गई है। इसमें मशहूर मुंबई हाई और वसई ईस्ट ऑयलफील्ड शामिल हैं, जिनकी बिक्री के प्रस्ताव को भारी विरोध हुआ। गुरुवार को सूत्रों ने यह जानकारी दी।

नीति आयोग के उपाध्यक्ष राजीव कुमार की अध्यक्षता वाली उधा अधिकार प्राप्त एक समिति ने पिछले साल मुंबई हाई के पश्चिमी अपतटीय तेल एवं गैस फील्ड, हीरा, डी-1, वसई ईस्ट और पन्ना के साथ असम में ग्रेटर जोराजन और गेलेकी फील्ड, राजस्थान में बाघेवाला और गुजरात में कलोल फील्ड निजी क्षेत्र की भारतीय और विदेशी कंपनियों को बेचने करने पर विचार किया था।

नीति आयोग और सरकार के कई सूत्रों ने कहा कि तेल एवं प्राकृतिक गैस (ओएनजीसी) के साथ सरकार के भीतर ही कुछ लोगों के पुरजोर विरोध के कारण देश के मौजूदा तेल एवं गैस उत्पादन में 95 प्रतिशत का योगदान करने वाले इन फल्ड्स को प्राइवेट कंपनियों को नहीं दिया जा सका। उनका कहना था कि प्रस्ताव में कुछ चीजें नदारद हैं।

इन नौ फील्ड्स के अलावा 49 छोटे क्षेत्रों का क्लस्टर बनाकर उन्हें नीलाम किया जाना था। कुल घरेलू उत्पादन में इन फील्ड्स का योगदान करीब 5 प्रतिशत रहता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों के पुराने पड़ चुके फील्ड्स से उत्पादन बढ़ाने के उपाय तलाशने को लेकर समिति गठित की थी।

समिति ने 29 जनवरी, 2019 को अंतिम रिपोर्ट दी थी, लेकिन प्रस्ताव ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। रिपोर्ट में सरकारी तेल कंपनियों को उत्पादन बढ़ाने के लिए फील्ड्स के चयन, संयुक्त उद्यम बनाने आदि के मामले में आजादी देने की सिफारिश की गई थी।

कंपनी ने किया था विरोध

ओएनजीसी का कहना था कि उसने पिछले चार दशकों तक कड़ी मेहनत और अरबों डॉलर निवेश करके जो खोज और विकास की है, उसे प्राइवेट कंपनियों को थाली में सजाकर नहीं दे सकती। दूसरी तरफ सरकार में शामिल कुछ लोग भी इस बात से सहमत नहीं थे कि इससे उत्पादन की संभावना बढ़ेगी। उनका कहना था कि वास्तविक बेसिन या फील्ड अध्ययन के बगैर बढ़े हुए उत्पादन आंकड़ों तक कैसे पहुंचा गया।

ऐसी थी बिक्री योजना

यह प्रस्ताव समिति के समक्ष लाया गया था। समिति को इन ऑयल फील्ड्स के बारे में निजी और विदेशी कंपनियों से बढ़े हुए उत्पादन का खाका प्राप्त करने के बाद उन्हें मार्केटिंग और कीमत के मामले में पूरी आजादी देनी थी। सूत्रों ने बताया कि सरकारी तेल कंपनियों को सामान्य स्थिति में बढ़े हुए उत्पादन में 10 प्रतिशत हिस्सा मिलना था।

निजी कंपनियों का दावा

निजी व विदेशी कंपनियों ने नए ब्लॉक लेने की जगह ओएनजीसी और आयल इंडिया की चालू तेल-गैस फील्ड में हिस्सेदारी लेने की इच्छुक थीं। उनका कहना था कि वे नई पूंजी और टेक्नोलॉजी के दम पर उत्पादन बढ़ा सकती हैं।

सरकारी कंपनियों की दलील

इस मामले में सरकारी कंपनियों की दलील थी कि उनके पास कीमत और मार्केटिंग का अधिकार नहीं हैं। बावजूद इसके वे उत्पादन बढ़ाने के लिए उन तमाम टेक्नोलॉजी ला सकती हैं, जिन्हें लाने का दावा प्राइवेट कंपनियां कर रही हैं।