चिल्फीघाटी, बेमेतरा । जिले के अंतिम छोर पर बसा वन ग्राम बेंदा में पुरातत्व विभाग की अनदेखी के चलते ग्यारहवीं शताब्दी में बनी प्राचीनकाल की मूर्ति बिखरी पड़ी है। जिसे जिम्मेदार विभाग द्वारा ध्यान नहीं देने से दर्शनिक स्थल का महत्व कम होता जा रहा है।

कई वर्षो से बिखरी पड़ी इन प्राचीन मूर्तियों को संजोने की जरुरत है। खंडर में तब्दील हो चुकी इस मंदिर में विद्यमान शिवलिंग को समय-समय पर ग्रामीणों द्वारा साफ-सुथरा किया जाता तो जरूर है पर रखरखाव के अभाव में यह दर्शनिक स्थल अपना महत्व खोता नजर आ रहा है।

मौके पर नईदुनिया की टीम ने स्थल का मुआयना किया। तो ग्रामीणों ने बताया कि इतिहास को देखा जाये तो यह शिव मंदिर ग्यारहवीं शताब्दी का हो सकता है। जिले के विख्यात भोरम देव मंदिर व पचराही में स्थित मंदिर में लगे पत्थरों में अंकित चित्र हूबहू इन पत्थरों से मिलता जुलता है।

ऐसे में फणिनागवंशी राजाओं द्वारा निर्मित विद्यमान इन मंदिरों में भगवान शिव के साथ माता-पार्वती व गणेश की प्रतिमा विराजमान है। ग्रामीण हरीश यदु, सरपंच बृजलाल मेरावी, भागवती यादव, बहल बैगा, विष्णु बैगा ने बताया कि उन्हें 50 वर्षों से ज्यादा हो गांव में निवास करते।

बताया जाता है कि अभी तक इन 50 वर्षो में पुरातत्व विभाग के जिम्मेदार अफसर दो से तीन बार आ चुके है और उन्हें गांव में बिखरी पड़ी पत्थरों पर अंकित चित्रों से बारे में मालूम भी हो चुका है। चित्रों से अंकित पत्थरों को देखकर लगता है कि फणिनागवंशी राजाओं के समय में शिव मंदिर स्थापित था। जो देखरेख के अभाव में अब यह मंदिर खंडर में तब्दील हो चुका है।

बिखरी पड़ी मूर्तियों में पत्थरों से बना हांडी, गुम्बज, चकरी, भगवान शिव, पार्वती व गणेश की प्रतिमा विद्यमान है। जिसे देखकर शिव मंदिर होना बताया जा रहा है। बिखरी पड़ी चित्रों से अंकित पत्थरों को ग्रामीणों द्वारा कतार बद्घ रखा गया है। चित्रों से अंकित पत्थरों की टूट-फूट होने से आसपास के 200 मीटर के दायरे में बिखरी पड़ी है। ग्रामीणों की माने तो विभाग द्वारा अगर इस धार्मिक स्थल का दर्जा दे दिया जाये तो दूर-दूर से आये सैलानियों को एक और दर्शनिक स्थल मिल जाएगा।

ग्रामीणों आज भी किया जाता है पूजा-पाठ

ग्रामीणों ने बताया कि वर्षों से बिखरी पड़ी इस मूर्तियों की पूजा-अर्चना आज भी महाशिवरात्रि में किया जाता है।भोरमदेव के नाम से विख्यात शिव मंदिर से जुड़े होने से इसकी मान्यता भी मानी जाती है, लेकिन इन खंडित हो चुके मूर्तियों को सहजने की जरूरत है।

बताया जाता है कि अगर विभाग इस ओर ध्यान नहीं देता है तो आने वाले 10-15 सालों में बिखरी पड़ी मूर्तियां मिट्टी में तब्दील होने से नजर नहीं आएगी। लगातार बारिश से क्षीर्ण हो रही मूर्ति अपनी पहचान खोता जा रहा है।

- पिछले 70 वर्षों से इस गांव में निवासरत हूं और तब से इस बेसकिमती मूर्तियों को दिनों-दिन क्षीर्ण होते देख रहा हूं। इसे सहजने की जरूरत है। इसे दर्शनिक स्थल के रूप में देखना चाहता हूं। पहले के बुजुर्गो द्वारा आए दिन देखरेख किया जा रहा था। अबकी पीढ़ी ध्यान नहीं दे रहा है। इसे सबंधित विभाग को ध्यान देने की जरूरत है।- भागवती यादव (ग्रामीण), वनग्राम बेंदा

- गांव में बिखरी पड़ी इन चित्रों से अंकित मूर्तियों को देखकर ग्यारहवीं सदी के बने प्रतीत होता है। इसे सहजने की आवश्यकता है। गांव के प्रबुद्घ लोगों द्वारा समय-समय पर साफ-सफाई कर महाशिवरात्रि पर पूजा पाठ किया जाता है। इसकी जानकारी विभाग को है और दो से तीन बार यहां आकर देखकर चले गए है। फिर भी इस ओर किसी द्वारा ध्यान नहीं दिया जा रहा है। आने वाले 10-15 सालों में ये मूर्तियां विलुप्त हो जाएगी। - हरीश यदु (ग्रामीण), वनग्राम बेंदा

प्राचीन मूर्तियों को ध्यान में रखते हुए लोगों के आने-जाने के लिए पंचायत द्वारा कधाी सड़क का निर्माण कराया गया था। और समय-समय पर गांव के लोगों द्वारा बैठक कर साफ-सफाई की जाती है। विभाग द्वारा ध्यान दे तो गांव में एक धार्मिक व दर्शनिक स्थल बन जाएगा। जिससे वनांचल के इतिहास में नाम दर्ज हो जाएगा। - बृजलाल मेरावी, सरपंच, ग्राम पंचायत बेंदा