0 एक माह से जमे हाथियों के कारण ग्रामीणों की दिनचर्या बदली

0 ग्रामीणों को समझाइश देने में जुटा हुआ है वन अमला

अंबिकापुर । नईदुनिया प्रतिनिधि

सूरजपुर व सरगुजा जिले के सीमावर्ती मोहनपुर इलाके में डटे हाथी अब अलग-अलग दलों में विचरण कर रहे हैं। लगभग एक महीने से हाथियों द्वारा फसलों को नुकसान पहुंचाया जा रहा है। धीरे-धीरे गन्ने की फसल भी समाप्त होती जा रही है। वन विभाग द्वारा ज्यादा से ज्यादा मुआवजा का आश्वासन देकर गांव वालों को हाथियों को न खदेड़ने समझाइश दी जा रही है। सोमवार की रात हाथियों ने सोनगरा, सारसताल, बोझा, चंद्रपुर व खड़गवां में कुल 27 किसानों के खेतों में खड़ी फसलों को नुकसान पहुंचाया। इधर बहरादेव हाथी घंघरी इलाके से आगे बढ़ जामदोहर, रेवतपुर की ओर चल गया है। इस हाथी द्वारा भी अकेले ही फसलों को क्षति पहुंचाई जा रही है।

हाथियों के बांकी व ईब दल के सदस्य जब मोहनपुर जंगल में मिले थे तो उस दौरान आसपास के कई गांवों में बड़े रकबे में गन्ने की फसल खड़ी थी। एक महीने से हाथी इस इलाके में फसलों को तबाह करने में लगे हुए हैं। गन्ने की फसल का रकबा भी अब कम होता जा रहा है। यही वजह है कि चारापानी की जुगाड़ में हाथी अब अलग-अलग दल में विचरण करने लगे हैं। आसपास के कई गांव हाथियों के स्वच्छंद विचरण से प्रभावित हैं। सोनगरा के सारसताल में मंगलवार की रात हाथियों ने 13 किसानों की गन्ना व गेहूं की फसल को नुकसान पहुंचाने के साथ ही सिंचाई पाइपों को क्षतिग्रस्त कर दिया। बोझा में तीन, चंदरपुर में चार व खड़गवां में सात किसानों की फसल हाथियों से तबाह हुई है। हाथियों द्वारा अबतक लाखों का नुकसान पहुंचाया जा चुका है। कई किसान नए सिरे से गन्ने की खेती करने की तैयारी में थे, लेकिन वे भी हाथियों से वर्तमान में खेती नहीं कर रहे हैं। मोहनपुर व उससे लगे आसपास के कई किमी क्षेत्र में हाथियों का अलग-अलग दल शाम ढलते ही विचरण में लग जाता है। ग्रामीणों की आवाजाही बंद हो जाती है। हर पल हाथियों का खौफ उन्हें सताने लगा है। गांव वाले हाथियों को असुरक्षित तरीके से खदेड़ने की कोशिश न करें, इसे ध्यान में रखते हुए वन अधिकारी व कर्मचारी हर रोज सुबह ही प्रभावित गांवों में पहुंच जाते हैं। प्रभावित ग्रामीणों को समझाइश दी जाती है कि उन्हें फसलों के नुकसान के एवज में अधिकाधिक मुआवजा दिया जाएगा, इसलिए वे हाथियों को खदेड़ने की कोशिश न करें। वन विभाग द्वारा हाथियों को संरक्षित वन क्षेत्रों में ले जाने की कोशिश भी नहीं हो रही है।