थानखम्हरिया। नईदुनिया न्यूज

भागवत मृत्यु के भय को दूर करता है। यह वैष्णवों का परमधन और परमहंसों की संहिता है। संहिता कहते हैं जो बिना परदे के जीवात्वा को परमात्मा से मिला दे। आत्मदेव ही जीवात्मा है जिसकी बुद्घि ही धुंधली है जो तर्क - कुतर्क करती रहती है।

नगर के गोलबाजार में आयोजित श्रीमद् भागवत सप्ताह ज्ञान यज्ञ के प्रथम दिन की कथा में व्यास पं संतोषी लाल पाराशर ने कहा कि सत्संग द्वारा प्राप्त फल को बुद्घि आत्मसात नहीं करती। सत्संग से ही विवेक की प्राप्त होता है जिसके द्वारा सत् - असत् का निर्णय किया जाता है। सत्संग के फल को बुद्घि आत्मसात कर ले तो विवेक जागृत हो जाता है। मनन, चिंतन तथा निदिध्यासन करने पर ही कथा का सधाा लाभ प्राप्त होता है। धुंधकारी ने कथा श्रवण करके मनन और निदिध्यासन किया इसके फलस्वरूप ही आत्मस्वरूप को प्राप्त कर लिया। पाराशर जी ने कहा कि समस्त पाप तापों को मिटाने वाली यह भागवत की कथा है जिसको श्रवण करने से परमात्मा हृदय में अवरूद्घ हो जाते हैं। भागवत कथा श्रवण करने से भक्ति, ज्ञान, वैराग्य की प्राप्ति होती है। भक्ति प्रगट होने से भगवान उस जीव के हृदय में अपना डेरा डाल देते हैं और अपने स्वरूप में ही समाहित कर लेते हैं। भागवत पंचम पुरूषार्थ है। भक्ति, ज्ञान, वैराग्य प्राप्त कराने का साधन है। कलिकाल में भगवान श्री कृष्ण का वांगमयी विग्रह है। भगवान के मुख से निसृत दिव्यवाणी है जिसको सुनकर जीव कृतार्थ हो जाता है। पूर्व में सिद्घेश्वर हनुमान मंदिर से कलशयात्रा निकाली गयी जो जमात मंदिर, जयस्तंभ चौक, मुरारका चौक होते हुये कथा स्थल पहुॅची इस दौरान अनेक स्थानों पर भागवत जी की पूजा आरती की गयी।