गाड़ाडीह, दुर्ग । पाटन विकासखंड के ग्राम भन्सुली के 23 वर्षीय तोरण लाल तुरकाने अपनी कमजोरी को ही अपनी ताकत बना लिया है। सात साल की उम्र में दोनों आखों की रोशनी चली जाने के बाद भी इन्होंने कभी हौसला नहीं खोया और सफलता के मुकाम तक पहुंचकर औरों के लिए आदर्श प्रस्तुत किया है। दिव्यांगता को कभी जीवन में बाधक बनने नहीं दिया।

ग्राम भन्सुली (केसरा) के 23 साल के तोरण लाल तुरकाने पूर्णतः दृष्टिहीन हैं, पर उनकी दृष्टिहीनता किसी भी मायने में उनके आड़े नही आती। एक छड़ी की मदद से वे कही भी आ जा सकते हैं और दैनिक कार्य भी बिना किसी की मदद के कर लेते हैं। ब्रेल लिपि में जिस स्पीड से वे पढ़ते और लिखते हैं कि लोग दांतों तले उंगलियां दबा लेते हैं। वे ब्रेल लिपि से लिखते हैं और ऑडियो टेप से याद करते हैं और अपने ही जैसे दृष्टिबाधित बच्चों को कुशलता से पढ़ाई करवाते हैं।

पाटन का आरएसटीसी बना तोरण की सफलता का कारण

तोरण लाल बताते हैं कि सात साल की आयु में उन्हें दिखाई देना बंद हो गया था। गांव के ही स्कूल में जैसे तैसे चौथीं क्लास तक पढ़ाई की और उसके बाद एक दिन स्कूल में आवासीय विशेष प्रशिक्षण केंद्र पाटन (आरएसटीसी) के घनश्याम साहू पहुंचे और उन्होंने दृष्टिबाधित के लिये ब्रेल लिपि और छड़ी की जानकारी दी।

2010 में पांचवीं पढ़ने पाटन आ गए और फिर पलट कर नहीं देखा। आठवीं तक आरएसटीसी पाटन में फिर नौवीं से 12वीं तक पढ़ाई शासकीय दृष्टि एवं श्रवण बाधित स्कूल मठपुरैना में की और 66 प्रतिशत अंकों के साथ 12वीं पास किया।

विगत कुछ दिनों से आवासीय विशेष प्रशिक्षण केंद्र पाटन में दृष्टि बाधित बच्चों को न केवल ब्रेल लिपि पढ़ा रहे हैं बल्कि संस्था के अन्य दिव्यांग बच्चों की संगीत की क्लास भी लेते हैं।यह काम वे निःशुल्क करते हैं। इसमे वे बच्चों को हारमोनियम और आर्गन बजाना सीखा रहे हैं। तोरण आगे की पढ़ाई जारी रखना चाहते हैं और एक शिक्षक बनना चाहते हैं।

दिव्यांग बच्चों का भविष्य बना रहा पाटन का विशेष प्रशिक्षण केंद्र

विशेष आवश्यकता वाले (दिव्यांग) बच्चों को विशेष प्रशिक्षण देकर उन्हें सामान्य बच्चों के साथ पढ़ने लायक बनाने के उद्देश्य से सन 2010 में खोला गया आवासीय विशेष प्रशिक्षण केंद्र इस आठ सालों में दृष्टिहीन, अल्पदृष्टिहीन, श्रवणबाधित, मूकबधिर, मानसिक दिव्यांग बच्चों को मुख्य धारा में ला चुका है। यहां से प्रशिक्षित बच्चे आज सामान्य स्कूलों में सामान्य बधाों की तरह पढ़ाई कर रहे हैं। केंद्र के बच्चे स्पेशल ओलंपिक में फुटबॉल और बोधी में अजमेर और भुवनेश्वर में जीत हासिल कर चुके हैं।

अब तक 66 प्रशिक्षित

अक्टूबर 2010 में 20 दिव्यांग बच्चों के साथ आवासीय विशेष प्रशिक्षण केंद्र शुरू हुआ था और विशेषज्ञों द्वारा ब्रेल लिपि इशारे से पढ़ाई और अन्य थैरेपी जैसे स्टेयर एक्सरसाइजर, व्हील एक्सरसाइजर, स्टेटिक अग्रोमिटर, अग्रोमील एक्सरसाइजर के जरिये दिव्यांग बच्चों को सामान्य बच्चों के साथ पढ़ने के काबिल बनाया जाता है। केंद्र के घनश्याम साहू ने बताया कि इन सात सालों में केंद्र से करीब 66 दिव्यांग बच्चों को सामान्य बच्चों के साथ पढ़ने लायक बनाया गया।