भिलाई, नईदुनिया। कंडरका गांव का तालाब कभी सूखता नहीं। इसकी दंतकथा बहुत रोचक है। कहा जाता है कि यहां के मालगुजार की पत्नी ने जिद करके तालाब खोदवाया था। स्नान के लिए वह दूसरे गांव के तालाब जाती थी। वहां की महिलाओं ने ऐसा ताना दिया कि बालों पर मिट्टी पोत घर लौट आई और पति को संकल्प दिलाया कि जब तक तालाब नहीं तैयार कराएंगे, वह नहाएगी नहीं। तब जाकर मालगुजार पति ने खोदवाया तालाब।

तब से यह तालाब आस्था और विश्वास का भी प्रतीक है। इस पर कभी नहीं हुआ अतिक्रमण न ही कोई इसमें गंदगी डालता है। पानी एकदम स्वच्छ। लोग इसमें नहाते भी हैं और 49 एकड़ में फैले इस तालाब से 250 हेक्टेयर खेतों की सिंचाई भी होती है। कंडरका के लोग तालाब का एक बूंद पानी बेकार नहीं जाने देते। एक तरह से यहां के लोग जलसंरक्षण की मिसाल पेश कर रहे हैं।

छतीसगढ़ के दुर्ग जिले के कुम्हारी के पास स्थित है ग्राम पंचायत कंडरका...। दो हजार की आबादी वाला गांव । गांव के सरपंच नकुलराम यादव, बुजुर्ग रघुनंदन सिंह राजपूत बताते हैं कि दो सौ साल पहले अंग्रेज के जमाने में यहां गुरमीन पाल गड़रिया की मालगुजरी थी। धन संपदा भरपूर होने के कारण गुरमीन को गौटिया भी कहा जाता था। वे अंग्रेजों के लिए लगान वसूलते थे। कहते हैं उनकी पत्नी बेहद खूबसूरत थीं। वो नहाने के लिए रोज पास के चेटुवा गांव के तालाब जाया करती थीं।

एक दिन वह बाल में मिट्टी लगाकर नहाने गईं तो चेटुवा गांव की महिलाओं ने उन्हें ताना मार दिया कि इतने बड़े मालगुजर की बीवी के पास नहाने के लिए खुद का तालाब नहीं है। बस फिर क्या था, मालगुजार की बीवी नाराज होकर घर लौट आईं। उसने प्रतिज्ञा की कि जब तक खुद का तालाब नहीं खुदेगा वह बाल नहीं धोएंगी। गुरमीन को जानकारी हुई तो परेशान हो गए और तालाब के लिए जगह खोजना शुरू कर दिया।

कुछ इस तरह मिला पानी

छतीसगढ़ में तब पानी मिलना रेत के ढेर में सुई खोजने के बराबर था। भीषण गर्मी का दिन... सारा गांव तालाब के लिए जगह की तलाश में था। तभी खबर आई कि गांव की एक भैंस दो दिन से गायब है। तलाश शुरू हुई तो वह गांव के पूरब दिशा में मिल गई, कीचड़ से सनी हुई। गुरमीन समझ गए कि पानी यहीं है। उस जगह पर कुदाल पड़ते ही पानी की महीन धार फूट पड़ी। ग्रामीण उसे पाताल से निकली धार कहते हैं। बताते हैं कि इसी धार की वजह से यह तालाब कभी नहीं सूखता।

ग्रामीणों और राजस्थान के गड़रियों ने खोदा

ग्रामीणों ने तालाब खोदने का काम शुरू किया। कहते हैं उस वक्त राजस्थान से भेड़ चराने वाले गड़रिया बड़ी संख्या में छत्तीसगढ़ आए थे। गुरमीन गौटिया ने सबको काम पर लगा दिया। दो महीने में 49 एकड़ में बड़ा तालाब खुदकर जब तैयार हुआ, तब गुरमीन की बीवी ने बाल धोए। गौटिया ने सबको भरपूर पैसे दिए। उसने तालाब के चारों तरफ आम के पेड़ लगवा दिए। तब से यह तालाब जल देवता बन गया। तब से आज तक इस तालाब को सूखा किसी ने नहीं देखा। इसका पानी बेहद साफ और मीठा है। इसकी वजह से आसपास के क्षेत्र में भूजल स्तर काफी ऊपर है।

नहीं रहे 'भागीरथी' के वंशज

इस तालाब के भागीरथी कहे जाने वाले गुरमीन गौटिया का वंश धीरे-धीरे खत्म हो गया। दस साल पहले तक इस परिवार की आखिरी पीढ़ी का पूरनपाल गड़रिया जीवित थे। उनके मरने के बाद गड़रिया मालगुजार की इस तालाब के रूप में यादें ही बाकी रह गईं। लोग इस तालाब के लिए गुरमीन को शिद्दत से याद करते हैं। कहते हैं कि यह तालाब भीषण अकाल के समय भी नहीं सूखा और यह आसपास के पचासों गांव की प्यास बुझा रहा है।