बिलासपुर। नईदुनिया प्रतिनिधि

वर्तमान में व्यक्ति अपनी स्वार्थवृत्ति में मशहूर होता जा रहा है। उसे दान धर्म आदि से दूर-दूर तक लेना देना नहीं है। यदि अपने जीवन में उत्कृष्ट होना है तो दान देना सीखना होगा। इनकी महिमा अचिंत्य है, जो देना सीख जाता है वही लाभ लेना सीख पाता है।

ये बातें पार्श्वनाथ दिगंबर जैन मंदिर सरकंडा में अष्टान्हिका महापर्व के छठवें दिन रविवार को माताजी सिद्घश्री, ह्रींश्री, आराधनाश्री व संस्तुतिश्री माताजी ने कही। उन्होंने आगे कहा कि लोभी को लाभ नहीं होता। लाभ सदैव त्यागी को होता है। आप जितना दान देंगे अच्छे कार्य करेंगे लोभ नहीं रखेंगे? उतना ही आपका जीवन सफल व सुंदर होगा आप अपने कर्मों को एक अच्छे रास्ते पर ले जा सकते हैं। इस अवसर पर सुबह माताजी के सानिध्य में अभिषेक, शांतिधारा व पूजन इंद्रों के साथ बच्चों ने भी किया। इसमें श्रावक-श्राविकाओं व बच्चों सहित 256 ने अर्थ चढ़ाए। आठ दिनों तक चल रहे सिद्घचक्र महामंडल विधान में पंच परमेश्ठी पूजन व नंदीश्वर दीप पूजन प्रमुख है। रविवार को हुए विधान में समाज के वरिष्ठ जनों के साथ बच्चों में अनंत, संयम, वासु, सम्यक, अंकित, रंजीत, नितिन, पराग, सैंकी, आदि, अर्हम, बिट्टू, स्वामी, मयंक, अतिषय, हर्ष, अमित, शुभम, रैना, निशी, सौम्या, अंजली, चंचल, अनन्या समेत बड़ी संख्या में समाज के लोग उपस्थित थे।